Top Letters
recent

सात साल की तड़प के बाद...मरने से पहले आखिरी ख़त, प्रिय सूफ़ी ! क्या तुम ये चिठ्ठी पढ़ोगी?

- चमन कुमार मिश्रा 

प्रिय सूफ़ी
तो क्या तुम मुझे छोड़कर वास्तव में चली गईं ? लेकिन तुम मुझे तन्हा छोड़ कैसे सकती हो ? क्या इसलिए छोड़ दिया कि तुम्हारी महान कल्पनाओं के लिए मेरे पास वक्त नहीं था ? मैं कल्पनाहीन होने लगा था। ख़बरों में रहने लगा था। ख़बरों में रहने वाला इंसान ऐसा ही हो जाता है । तर्कहीन, कल्पनाहीन, वात्सलय हीन, प्यार हीन, भावना हीन, संवेदनाहीन। उस ख़बरीय दैत्य की जकड़ में मैं भी था/हूं।

इसे भी पढ़ें...
'तुम्हारी यादें उस बेमौसम बारिश की तरह हो गई हैं, जो मुझे किसान की तरह बर्बाद कर देती हैं'

प्रिय सूफ़ी, सड़क पर फैले हुए मक्के के दानों की कल्पना, आकाश में बिखरे हुए तारों से कैसे की जा सकती है ? हो सकता है कि ऐसा संभव हो... महान लेखकों ने की हो। लेकिन मैं नहीं कर पाता। मेरे पास ‘गंदे’ यथार्थ के धरातल से इतनी ‘महान’ ख़बरें आती हैं, कि मुझे लगता है दुनिया में पापी, अत्याचारी, दानव और नीच लोगों की कमी नहीं है। इसलिए मैं कल्पना में भी कभी नायक नहीं बनाता… क्योंकि नायक बनाने के बाद एक ख़लनायक भी बनाना पड़ता है।

इसे भी पढ़ें...
प्रेम पत्र लिखना है? तो गर्लफ्रेंड के नाम लिखी एक हिंदुस्तानी डॉक्टर की ये खास चिट्ठी जरूर पढ़ें

सच बताऊं तो नायक से मुझे डर लगता है। प्रिय सूफ़ी, तुम अब भी वैसी ही दिखती हो क्या ? बड़ी-बड़ी आंखें… जिनमें काला चांद- जैसे सफेद आसमान में बिखरा हो। आंखों के ऊपर गहरे सुनहरे रंगे के पलक जैसे चांद की सुंदरता छिपाने के लिए क्षीर सागर से पानी भरकर रास्ते में खड़े हो गए हों। पानी भरे हुए स़फेद रंग के तुम्हारे गाल। गालों पर बिखरे हए नीले रंग के चमकदार पुष्प। पुष्पों से निकली अथाह समंदर जैसी महक। उस महक में उठते-गिरते ज्वार और मैं...।


तुम्हारी भूरी आंखों में अब भी उतनी ही गहराई है क्या...? बारिश के इंतजार में मोर की आंखों जैसी ? तुम्हारे कानों के पास स्पर्शीय बालों की कुछ लटें अब भी आ जाती हैं क्या...?  या फिर तुम्हारे अधर अब भी सर्दियों में लाल हो जाते हैं... सुर्ख लाल... लेकिन मैं कल्पना क्यों कर रहा हूं ? कल्पना करने का हक तो मुझे है ही नहीं…। मैं ख़बरची हूं... और मुझे ख़बरें देखनी हैं। देखो- ‘प्रेमिका पर प्रेमी ने किया 72 बार चाकू से वार।’ ‘सेक्स के लिए मना किया तो प्रेमी ने चेहरे पर तेजाब फेंका।’ ‘पार्क में नग्न अवस्था में मिली लड़की की क्षत-विक्षत लाश।’

ये मैं क्या लिख रहा हूं...???? मैं आज तुम्हारे लिए लिख रहा था... लेकिन फिर ख़बरें लिखने लगा। मैं कुछ नहीं लिखता... सिर्फ तुम्हारे नाम से सभी पन्ने भर दे रहा हूं। नहीं... फिर क्या लिखूं, कुछ मत लिखो...धर्म पर लिखता हूं... नहीं मौत पर लिखता हूं। धर्म पर लिखो या मौत पर लिखो दोनों समान हैं, धर्म पर लिखने से मौत की ही बारिश होगी। मैं प्रेम पर लिख रहा था। नहीं, मैं तुम्हें एक ख़त लिख रहा था। मैं लिख़ क्यों नहीं पा रहा हूं? मेरी ऊंगलियां कांप क्यों रहीं है? क्या मैं डर रहा हूं…? नहीं… हां, फिर मेरे सीने में हल्की अजीब-सी घबराहट क्यों हो रही है…??

इसे भी पढ़ें...

मैं डर ही रहा हूं ! नहीं ये डर नहीं है, ये तड़प है। तड़प, लाचारी वेदना, कमजोरी और पीड़ा को मैंने बेच दिया था। ख़बरों से इनका सौदा किया था। ये कल्पना फिर कैसे आ सकती हैं ? ‘दिल्ली में कुछ भी हमेशा के लिए नहीं जाता।‘ ‘तुम चुप रहो, नहीं तो तुम्हें हमेशा के लिए फोड़ दूंगा। तुम तो ये भी कहते थे, वो नहीं जाएगी फिर वो कैसे चली गई…?? इसी दिल्ली से होते हुए।

दिल्ली बहुत बदचलन है। बिल्कुल तुम्हारी तरह अपारदर्शी आईना!’ आईना उसकी तरह शरमा गया, और खुद के वज़ूद को उसकी तरह मेरे लिए मिटा कर चुप हो गया... हमेशा के लिए टूट गया... तेज़ आवाज़ में चटका था- थोड़ी-ही देर में उसकी तरह चला गया। ये इकलौता गवाह था, हमारी यादों का। सुनो प्रिय, कल्पनालोकीय संसार में पवित्रता कितनी महान होती है। उसी पवित्रता की दम पर तुम भी धर्मवीर भारती की पवित्र नायिका सुधा की तरह मुझे देवता समझती थीं। देवता...! लेकिन मैं चंदर भी नहीं हूं। उससे भी बदतर हूं।

इस अंतिम ख़त में, मैं कुछ छिपाना नहीं चाहता। तुम्हारा प्रेम महान था। पवित्र था। विश्वसनीय और प्रेमयुक्त था- शायद अब भी है। मेरी झूठी आदर्शवादी बातों की महानता में तुमने अपना सबकुछ मुझे सौंप दिया। लेकिन वो बातें तब झूठी नहीं थीं... क्या अब हैं ? लेकिन आदर्शवाद का पैमाना कौन तय करेगा ? ये समाज- छि: । तो वो सब सच था... लेकिन फिर झूठ क्या था ? हमारा प्रेम झूठ था...? तुम झूठ थीं… ? नहीं तुम नहीं हो सकतीं मैं होऊंगा... नहीं, शायद वो आईना झूठ था जिसके सहारे हमने उन लम्हों को जिया था जो...!!!! जीवन उच्च प्रतिमान स्थापित करने में बीत गया। आज जब उन सब प्रतिमानों को गिराने जा रहा हूं… तो डर क्यों नहीं लग रहा ?

इसे भी पढ़ें...

मुझे डरना चाहिए…या फिर इसको तुरंत मिटा देना चाहिए? मैं ऐसा कर क्यों नहीं पा रहा हूं…शायद किसी का डर ही नहीं है। लेकिन क्यों नहीं है? क्या तुम नहीं हो? तुम्हारे दिए हुए उपहार रात के अंधेरे में मैंने गाजियाबाद में ही फेंक दिए थे। अब यहां नोएडा की छतों पर खड़े होकर गाजियाबाद की गलियों में कुड़े के ढेर ढ़ूंढता हूं। शायद, वो उपहार... वो ख़त... वो यादें मिल जाए... तुम अब नहीं मिलोगी। लेकिन मैं ये क्यों करता हूं...?

रात को 10 बजे 2-3 डिग्री तापमान में छत पर खड़े होकर कोई रंगहीन, शोषणयुक्त, पूंजीवाद की प्रतीक विप्रो कंपनी को देखता है क्या ? उन सर्द हवाओं में कुछ तो है… या फिर मेरा वहम ही हो लेकिन कुछ हवाएं मेरे कानों तक आती हैं... धीमी मद्धम गति से हल्की बारिश से चिपकी हुईं, थोड़ी-सी ख़ामोशी और ढ़ेर-सारी शीतलता लिए मुझसे कहती हैं- देखो, वो भी छत पर खड़ी होकर तुम्हारी बातों को महसूस कर रही है। लोग मुझे पागल भी नहीं बोलते। मेरी उंगलियां की-बोर्ड पर कुछ भी लिखती जा रहीं है।

इसे भी पढ़ें...

दिल में तड़प है... लाचारी है... पश्चाताप का कड़वा दर्द है... बिछड़न की आह है... मिलने की बैचेनी है... सांसों में CO2 है... सड़कों पर जीवित लोथड़ों की भरमार है... दिलों में नफरत-गुस्से की भटियां चल रहीं है... मरे हुए मुर्गों से सड़कें सजी हैं... मरी हुई भीड़ में इकलौता मैं तन्हा हूं... मैं ही क्यों जिंदा हूं... चुप ! कल्पना मत करो, इनबॉक्स देखो... हजारो ख़बरें हैं- ‘ट्रंप राष्ट्रपति बन गया’- ‘यूपी इलैक्शन आ गया।’ ‘वैद्य का आरक्षण पर बयान आ गया।’ हजारों ख़बरों के बीच एक ख़बर रोज़ ढूंढता हूं… उसी इनबॉक्स में तुम्हारा मैसेज हो जिसमें लिखा हो- “मैं मंडी हाउस पर खड़ी हूं, तुम आ सकते हो।” उस मैसेज़ का इंतजार करते-करते बरसों बीत गईं।

अब मुझे लग रहा है तुम थोड़ी-सी बूढ़ी हो गई होंगी। शायद तुमने अपने बाल बनाने की स्टायल बदल दी हो। गालों पर नीले फूलों की चमक अब ना हो... सर्दियों में होंठ सुर्ख लाल ना होते हों... क्या तुम अब भी सुधा से प्रभावित हो। सच बताना, तुमने गुनाहों का देवता पढ़ना बंद किया या नहीं…? लेकिन मुझे कौन बताएगा तुम तो ऑनलाइन ही नहीं हो… तुम कहीं नहीं हो... कहीं चलीं गईं हो, कहां…? लखनऊ, नहीं शायद कोलकाता… या फिर मद्रास नहीं तुम तो बलिया में हो। मुझे ऊधर के किसी नई कविता के कवि ने एक दिन बताया था कि तुमने एक सम्मेलन में फेमिनिज्म के नाम पर ढोंग करने वाले लेखक और कवियों की हालत ख़राब कर दी थी।

तुम कितनी विरोधाभासी थी/हो… तुम्हारी आधी जिंदगी एक महान भारतीय समर्पित प्रेमिका की तरह बीत गई। इस पर तुम फेमिनिज़्म की स्पेशलिस्ट भी हो ? उस कवि ने बताया था कि तुम्हारा विवाह किसी क्लर्क से तय हो गया है। लेकिन क्या ये ब्याह करने की उम्र है…? तुम्हें अभी बहुत कुछ करना है…लेकिन मैं तुम्हें ये क्यों बता रहा हूं…? तुम्हारी कल्पना में एक ऐसा वर/प्रेमी रहता था जो सड़क पर फैले हुए दूध की आसमान के तारों से तुलना करे। तुम एक क्लर्क के साथ कैसे निबाह पाओगी? लेकिन मैं परेशान नहीं हूं…दरअसल मैं हूं ही कौन…? कोई नहीं…फिर भी मैं परेशान हूं...बहुत परेशान हूं...देखो, मेरा चेहरा पीला पड़ गया है...मेरी आंखे धसती जा रहीं हैं...आंखों के नीचे काले धब्बे गहरे काले बनते जा रहे हैं...कई-कई दिनों तक मैं रज़ाई में पड़ा रहता हूं...

इसे भी पढ़ें...

क्या तुम ये चिठ्ठी पढ़ोगी...चिठ्ठियां हमारी महान साथी होती हैं...ये मेरी अंतिम चिठ्ठी है प्रिय सूफ़ी....डॉक्टर कोई रोग बताते हैं...कोई कैंसर जैसा रोग...कैंसर कोई रोग होता है क्या...??????????....लेकिन प्रिय सूफ़ी, मैं रोज़...’पम्मी’ के पास जाता हूं, वो कहती है कैंसर कोई रोग नहीं होता...तो क्या कैंसर कोई रोग नहीं होता...लेकिन मैं जानता हूं, पम्मियां भले ही हमारी पहली प्रेमिका ना हों...वो सुधा भले ना हों....लेकिन वो हमें प्यार तो करतीं हैं...नहीं, तो वो झूठ क्यों बोलती....सुनो, सूफ़ी- मैं जा रहा हूं...वो जी...रोड मेरा पता है...

ख़त मिले तो अंतिम बार देखने आ जाना...तुम आओगी ना...?? तुम आना क्योंकि आकाश में मोती बिखरे रहते हैं...हमेशा पास-पास रहने वाले सितारे उतनी ही दूरी बनाकर रहते हैं- महान पवित्रता-महान प्रेम-महान त्याग- बिल्कुल शुद्ध...जैसे सड़क पर फैला हुआ दूध अपनी शुद्धता को बिना छोड़े बह जाता है... तुम समझ रहीं हो ना... कल्पना... दूध की आकाश के साथ... अब तो आओगी... मैं जा रहा हूं... लेकिन मैं लिखता हुआ जाऊंगा... रास्ते की एक-एक चीज़ पर तुम्हारा त्याग... अपनी करूणा... आईनें का दर्द...’’पम्मी’’ का समर्पण और केंसर का रो....

तुम्हारा
जवाहरलाल
[अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]
Myletter

Myletter

Powered by Blogger.