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तमन्ना, प्यार का तो पहला अक्षर ही अधूरा है, फिर हम दोनों पूरे कैसे हो सकते हैं?

- चंदन कुमार

प्रिय तमन्ना

तुम मेरी जिंदगी से जा चुकी हो, लेकिन मैं एक आरजू दिल में छुपाये फिर रहा हूं। कभी कह नहीं पाया तुमको, इसलिए कि तुम कहीं नाराज न हो जाओ मेरी गुस्ताखी से...पर अब जब तुम नहीं हो, खोया रहता हूं तुम्हारे ख्यालो में... जमाने का कोई होश भी नहीं है मुझे... तेरी यादों के जज्बात इस कदर छलक रहे हैं, मेरी आंखो में कि बिना देखे तेरी तस्वीर बार-बार बना रहा हूं। धड़कन तो मेरी खामोश है... पर नजरें तुम्हें तलाश रही है। ठीक वैसे ही जैसे चांद नूर की तलाश में भटकता है। मैं भी भटक रहा हूं और भटकते-भटकते बुझ गया हूं। वह गर्दिश का सितारा जलके... जो कभी सबको रोशन किया करता था... अब वह सितारा वहां बेइंतहा दर्द से तड़प रहा है। हमारी खामोशी, हमारी आहट, हमारी आंखें, हमारी चाहत सब स्थिर हो गया है तमन्ना। शांत, ठंड़ा, अकड़ा हुआ एक लाश की भांति.....

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प्रिय ! ये रात गहरी हो चली है, सामने टेबल लैंप की पीली रोशनी मेरी नाकामी पर हंस रही है ! 

लेकिन मैं जिंदा हूं....मैं जिंदा क्यों हूं? मुझे तो मर जाना चाहिए...पर मैं मर नहीं सकता....मैं मर इसलिए नहीं सकता कि तेरे ख्वाब जो सलामत हैं मेरे लहू के हर कतरे में...रात दिन उसे सहेज कर रखता हूं....अब किसी राह की ख्वाहिश नहीं है दिल में... हमने जब देखे थे एक रहगुज़र, साथ चलने की जो अब अलग हो गए हैं। जिस्म से होने वाली मोहब्बत आसान है... पर जिसे रूह से मोहब्बत हो जाए उसे अलग कैसे किया जा सकता है प्रिय। वह गुजर रही है बस तेरे वापस आने की आस में... मैं जानता हूं कि तुम नहीं आओगी, पर मन कहां किसी की सुनता है। यह तो चंचल है हर पल तुझसे मिलने की प्यास लिये फिरता है। सब कुछ है यहां बस तुम नहीं हो तमन्ना। तुम कहीं भी रहो पर तेरे सर पर एक इल्जाम तो हमेशा रहेगा... तेरे होठों की लकीरों पे मेरा नाम तो हमेशा रहेगा... तुम मुझको अपना बना या न बना लेकिन तेरी हर एक धड़कन में मेरा नाम तो हमेशा रहेगा।

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एक ख़त उस दोस्ती के नाम, जो अब शायद तुम्हारे लिए बेमानी है!

वो ख्वाब जो कभी हम पाला करते थे अपने आंखों में... पानी से तस्वीर बना कर, अब कहीं भटक रहे हैं। तुम अक्सर कहती थी न तमन्ना इश्क है वही, जो एक तरफा हो, इजहार-ए-इश्क तो ख्वाहिश बन जाती है, है अगर इश्क तो आंखों में दिखाओ, जुबां खोलने पर ये नुमाइश बन जाती है। मैं जुबान नहीं खोलता क्योंकि मैं अपने इश्क की नुमाइश नहीं करना चाहता। क्योंकि मैं जानता हूं इश्क तो महसूस और महफूज करने की चीज है नुमाइश की नहीं.... तुम जानती हो कितनी बातें याद आती हैं तुम्हारी.... और फिर वह तस्वीरें सी बन जाती हैं... अब उन यादों को धागे से सीने की कोशिश करता रहता हूं तमन्ना। मैं उन लम्हों को फिर से जीने की कोशिश करते रहता हूं.... जो ओस से भी हलके थे.... वह अश्कों की बूंदें, जो तुम उस दिन जाते वक्त गिरा गई थी...अब वह अश्क बार-बार मुझे बेचैन कर रहे हैं... तुम्हारा इश्क दिखावा नहीं था प्रिय... तुम्हारा प्रेम तो उतना ही पवित्र था... शायद है... जितनी पवित्र आत्मा।


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एक्स गर्लफ्रेंड को दूसरा ख़त, तुम्हारे गले की वो खनक मेरे कानों में आज भी कैद है 


तुम नहीं हो और तुम्हारे बिना जिंदगी भी नहीं है... जिंदगी, मैं फिर भी हर दिन जीने की कोशिश करता हूं। एक भ्रम, मैं रोज पैदा करता हूं तुम कहीं नहीं गई हो ...तुम यहीं हो मेरे पास मेरे हर एक सांसों में, मेरी हर एक धड़कन में...मेरे लहू के हर के कतरे में...कुछ भी तो नहीं हुआ है....हम दोनों के बीच सब सही तो है...पर अचानक मेरी आंखों के कोरों से आंसू छलक आते हैं...क्योंकि मैं अपने जिस्म से तो झूठ बोल लेता हूं तमन्ना... पर अपनी रूह से झूठ नहीं बोल पाता....वह भ्रम जो मैं खुद बुनता हूं तुम्हें भुलाने के लिए वह टूट जाता है। अधूरे ख्वाबों की दहलीज़ पर खड़ा, आज भी तेरी राह तकता है, अब कोई नहीं, कहीं नहीं, दिल के पास, मेरा वजूद एक सवाल बन गया अब तो, मेरे ही 'आप' अब मेरे आसपास नहीं.....तुम जानती हो... जब भी मुझे याद उस लम्हे की आती है। मोहब्बत कसक बनके उभर आती है। मेरी आंखों से आंसू की शीतल धारा छलक पड़ती है।

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अब मन करता है खामोशी की सब दीवार तोड़ दूं, तुम्हें जाकर सब कुछ बोल दूं.... कुछ मैं तुमसे बोलूं कुछ तुम हमसे बोलो... दिल से ज़ख्म, ज़ख्म से दर्द का सफ़र बहुत हुआ, आज हम एक दूजे पर मरहम बनकर लग जाएं...पर यह भी महज़ एक स्वप्न भर है। मैं किसी तरह के भ्रम में अब जीना नहीं चाहता, इस लिए शायद मेरी आंखों से आंसू छलक रहे हैं। ये याद है तुम्हारी या यादों में तुम हो, ये ख्वाब हैं तुम्हारे या ख्वाबों में तुम हो, मैं नहीं जानता... तमन्ना तुम्हारे शरीर की खुशबू मैं हमेशा महसूस करता हूं। अजीब सी बेकरारी रहती है। दिन भी भारी, रात भी भारी रहता है।

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पूर्व प्रेमिका के नाम एक प्रेमी का ख़त, वो इश्क़ भला क्या इश्क़ हुआ, जो आसानी से हो जाये !

वह आईना भी मैंने तोड़ दिया इस ख्याल से कि शायद हमारी तकदीर बदल जाए...पर आईने के हर टुकड़े में सिर्फ तुम्हारी ही तस्वीर नजर आती है। तुम जानती हो मुझे अब ऐसा प्रतीत होने लगा है कि प्यार कहां किसी का पूरा होता है...प्यार का तो पहला ही अक्षर ही अधूरा है। जब वह पूरा नहीं है तो हम पूरे कैसे हो सकते हैं....तमन्ना सच्चे प्यार में निकले आंसू और बच्चे के आंसू एक समान होते हैं। क्योंकि दोनों जानते हैं दर्द क्या है पर किसी को बता नहीं पाते...ठीक वैसे ही हम जानते हैं दर्द कहां और कैसे है हम कह नहीं पाते।

तुम्हारा
पारस
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