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इंटरनेशनल वीमेंस डे पर एक पुरुष की चिट्ठी, महिलाओं के लिए साल में सिर्फ एक ही दिन क्यों?

- पवन नाहर 
इसे लिखते हुए मैं थोड़ा डर रहा हूं। असल में किसी लड़के का चिट्ठी बहुत खतरनाक होता है। पिटने का पूरा इंतजाम। और मैंने तो सभी स्त्रियों के नाम चिट्ठी लिखने की ठान ली है। असल में सुबह उठा तो याद आया कि आज तो 8 मार्च है। यह कैलेंडर के पन्नों पर सिर्फ एक तारीख भर नहीं है। आज का दिन आप सभी के लिए खास है। यह मेरे लिए भी खास है। आज International Women’s Day मनाया जाता है।

मैंने सुबह-सुबह गूगल किया और पाया कि कैसे 1914 में रूसी औरतों ने संडे देखकर ‘साड्डा हक’ की बात शुरू की और तब से यह सोसाइटी में महिलाओं को respect और equality दिलाने के लिए यह दिन मनाया जाता है। इस बारे में ज्यादा ज्ञान चाहिए तो विकिपीडिया देख लें, मेर ख्याल से इसमें टाइम बर्बाद करना कोई समझदारी नहीं।

मैं आप सबसे यह पूछना चाहता हूं कि महिलाओं के लिए सिर्फ एक दिन ही क्यों? सोसाइटी के बेटर हाफ के लिए सिर्फ एक ही दिन? यह भी तो एक किस्म के sexism ही है। मगर रुकिए तो सही… जेन्ट्स के लिए ऐसा कोई दिन है क्या? जी हाँ, 19 नवंबर को International Men’s Day होता है, जो 1999 से शुरु हुआ। चलिए सुन कर अच्छा लगा कि कहीं तो लड़कों को प्राथमिकता मिली।

अब ये Women’s Day का कॉन्सेप्ट ही ऐसा है कि साल के 364 दिन उन्हें unequal समझो और एक दिन देकर खुश कर दो। इससे मुझे अपने बचपन की याद आती है, जब मैं चॉकलेट की जिद करता है और मुझे टॉफी देकर खुश कर दिया जाता था। यह प्रैक्टिस घर, स्कूल, कॉलेज, ऑफिस, सरकार हर जगह होती है।

गौर करिए, India में नारी शक्ति को मनाने के लिए कई मौके हैं। बस बात सिर्फ इतनी है कि हम इन्हें त्योहार कहते हैं। नवरात्रि हम साल में दो बार मनाते हैं, रक्षा बंधन, तीज, भाई दूज, करवा चौथ, दीपावली पूजन, होलिका दहन, बसंत पंचमी आदि लगभग सभी त्योहारों को महिला शक्ति का symbol ही माना जाता है। मुद्दा असल में यह है कि हमारी so-called मॉडर्न सोसाइटी और Patriarchy इसे daily routine में पचा नही पाती।

अगर हम बाकी दुनिया की ओर देखें तो सुपरपावर अमेरिका 1776 में आजाद हुआ, मगर 240 सालों में एक बार भी महिला राष्ट्रपति नहीं बनी। इंडिया न सिर्फ प्राइम मिनिस्टर, बल्कि प्रेसिडेंट भी female दे चुका है। यहां तक कि एक महिला के पास ‘बैकडोर’ से सरकार की बागडोर रही है। यहां तक कि हमने भगवान में Goddesses को काफी बड़ा स्थान दिया है।

तो बात equality की है इसलिए इसकी झलक डेली लाइफ में दिखनी चाहिए। Equality का रोना सिर्फ एक तरफा नहीं होना चाहिए और यह बात पुरूष और महिलाओं दोनों के लिए है। मसलन कि दिल्ली मेट्रो में अगर तीन कोच महिलाओं के लिए है, तो क्यो वो general कोच में ट्रेवल नहीं करेंगी? और अगर करेंगी तो क्या वहां उनके लिए सीटें रिजर्व होनी चाहिए? आप साधारण कोच में खड़े हो कर यात्रा करिए। वहाँ स्पेशल ट्रीटमेंट क्यो लेना है।

Please अब यह मत कहिएगा कि हजारों सालों के हमारे साथ नाइंसाफी हुई है और हमें सोसाइटी के reform की जरूरत है। तो मैने कब कहा कि social reforms की जरूरत है ही नहीं। मेरा कहना सिर्फ इतना है कि लेडीज.. social reforms वो आने चाहिए जो social equality, justice और independence की बात करें। हाँ, अगर बदले की भावना से डॉमिनेट ही करना है तो हम सब जानते हैं कि Patriarchy का उलटा Matriarchy होता है।

तो मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि माँ, बहन, बेटी, पत्नी, गर्लफ्रेंड, दोस्त आदि कई रोल में आपने अहम योगदान दिया है। इसलिए इस Womanhood को सिर्फ एक दिन तक सीमित न रखिए। इसे रोज मनाएं… एक दिन में संतुष्ट होने का मतलब है कि आप जो मिल रहा है उससे खुश हैं।

My Last Note to All Females – “Fight for Equality, Not for Matriarchy. Else, in the next age, you will be questioned and none would like to see you Speechless”
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