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भक्तों, मैं गऊ मां बोल रही हूं; हमें मां मानने वाला देश बीफ़ निर्यात में विश्व गुरु बन चुका है

- चंद्र मोहन 

आज मैं गैया मैया बोल रही हूँ। मैं जंगली, अल्हड़ और मस्त खुले मैदानों में घूमा करती थी। दिन भर का बस एक ही काम धरती माँ की छाती के बाल नोंच नोंच के उनकी वैक्सिंग करना ख़ुद का पेट भरना और धप से गोबर कर देना। ख़तरे थे पर प्रकृतिक, जो कि वो क्या कहते हैं; परिस्थितिकि तंत्र को संतुलित करने का ही काम करते थे। जैसा कि होते हैं हमारे जंगल के राजा साब ही हमारे लिए ख़तरा हुआ करते थे। कभी कभी शिकारी कुत्ते वगेरा भी आ मरते थे, जिन्हें आप छुट भैये नेता से तहसीलदार तक मान सकते हैं, मैं बुरा नहीं मानूँगी.

फिर एक अजीबोग़रीब दो पाया जानवर आया और उसने सब कुछ उलट पलट कर दिया। जिस प्रकार ज़रूरत पढ़ने पे इसने गधे को बाप बना लिया, उसी प्रकार ज़रूरत पढ़ने पे हमें माता बना डाला। मेरे सगे बछड़ों से कहीं अधिक इन हिंदू शेरों ने ख़ुद को मेरा बेटा घोषित कर मारा। उसने हमारे घर के मर्दों को उनके खेतों में बंधुआ मजूर बना डाला और हमें माँ कह के सार में बाँध लिया। वो ख़ुद के घर की माँ बहनों को तो स्तन से चुन्नी ना हटाने देता है पर मुझ गौ माता के स्तन दोह दोह के दूध निकाल अपने बच्चों को पिला देता। इन नास पीटो से कोई पूँछे कोई इनकी बहन बेटियों के साथ ऐसा करे तो??

चलो ये भी सह लेते कि घर बैठे चारा दे रहा है, पर वो ज़ालिम यहीं नहीं रुका बल्कि माँ बोल बोल के हमारा दूध निचोड़ cow mother dairy तक खोल, कभी दूध तो कभी फटे दूध तक को ना छोड़ मेरे बच्चों का हिस्सा बेंच के पैसे भी कमा बाबा, लाला और ना जाने क्या क्या बन अपनी आर्थिक स्थिति में AMUL चूल परिवर्तन लाया बल्कि अश्वमेध यज्ञ की ही भाँति गौ मेध यज्ञ सा मचा पूरे आर्यावर्त का शासक सा बन बैठा ..

असल में दूध तो ख़ैर अब भेंस का पीते हैं ये लोग पर हमारा राजनीतिक महत्व इतना मलाईदार है कि जंगल का राजा क्या इंसानों के राजा की भी फटती है। गौ शाला के नाम पे चारे की तरह पैसा उगाह ख़ुद ही खा जाते हैं। हमारे नाम पे वोट लेते हैं और अपने ही चमार भाइयों को उन्हीं के हाथों मेरे चमड़े से बने अपने जूते से कूटते हैं। हमें माँ मानने वाला देश बीफ़ निर्यात में विश्व गुरु बन चुका है। अब तो बस यही उम्मीद है की जल्दी से जल्दी क़सम राम की खाते हैं मंदिर वहीं बनाएँगे वाले फटाफट मंदिर बना के "क़सम कृष्ण की खाते हैं गौ शाला वहीं बनाएँगे" जैसा कुछ हृदयभेदक ले के आएँ और घोंप दें ..


शेर बेटा: 

ऊपर माँ के बयान को तोड़ मरोड़ के पेश किया गया है। आप ही बताइए महिला ऊपर से गाय ऊपर से माता वो भी कामधेनु, कभी ख़ुद की फ़िक्र करती है भला? वो तो त्याग की मूर्ति होती है। आपको जानकर आश्चर्य और ख़ुशी दोनों होगी कि हमारी ये माता कोई साधारण ग्रहणी की तरह घर तक सीमित नहीं बल्कि विदेशी इन्हें देख लार टपकाते हैं। ये हमारी गऊ माता ही हैं जिन्होंने बीफ़ बनके आर्यवर्त का परचम सारी दुनिया में लहरा दिया है, माँ जो ठहरी मरने के बाद भी अपने बच्चों को इतना डॉलर वगेरा दे जाती है की पूछिए मत ..

ऊपर से हमारी विश्वगुरुघंटाल संस्कृति जिसने पाश्चात्य कुविज्ञान को लतिया के हमारे वेद पुराण में रचे बसे असली ज्ञान को अपना माते का महत्व और बड़ा दिया। आज हम इनके मूत्र मात्र से दुनिया को कैन्सर का इलाज तो दे ही रहे हैं बल्कि हमारे दुश्मनों के परमाणु बम (काहे के परमाणु) के दाँत माता के गोबर से ही खट्टे किए दे रहें हैं। हम हमारी गऊ माता का मूत भी पी जाते हैं, तुम साले चार माँ की औलादों अपने बाप के मूत की पैदावार हो तो अपनी जैविक माँ का ही पी के दिखा दो। सस्स्याला .. ख़ुद खाने के चुनाव के अधिकार और स्वाद के बहाने समूची गाय खा जाओ तो कुछ नहीं पर जो हम गौ रक्षा की बात करे तो गाय के भोजन चुनाव के अधिकार पे ऊँगली उठा के उसे पोलिथिन ना खाने देने का ज्ञान पालने लगते हो। भारी दोगले हो यार ..

हमने तो यहाँ भी नारी सशक्तिकरण पे ज़ोर दिया है। हमारी इस गऊ माता की पुत्रियों को हम पराया धन नहीं समझे बल्कि घर में ही बहू बना के रखे। उलटा बेटों को ससुराल भेज देते हैं और यहाँ भी हम दहेज की कुप्रथा पर चोट करते हुए पर्याप्त दाम वसूलते हैं। भाइयों और भाभियों अब माता तो माता ही होती है फिर हमारी गऊ माता कोई ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी टाइप माता तो है नहीं. ये तो करोड़ों देवी देवताओं को अपने में समाहित रखने वाली माता है। हम तो यहाँ तक कहते हैं इस देश की बेटियों को गऊ होना चाहिए, माँ होना चाहिए, पवित्र होना चाहिए जिस से वो भी देश समाज के इतना ही काम आ सकें ..

अंत में यही कहना चाहूँगा कि.. गाये हमारी माता है और हम इसे राष्ट्रीय पशु और देश की बेटियों को गाय बना के ही रहेंगे ..तो देश की बेटियों बताओ गाय जैसी बनोगी कि नहीं??
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