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'मैं उनके लिए मौत की सज़ा नहीं चाहती, एक दिन उन्हें अपने गुनाहों का अहसास जरूर होगा'

बिलकिस बानो

मुझे हमेशा से न्यायपालिका में पूर्ण विश्वास रहा है. मैं इस फ़ैसले के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट की आभारी हूं. यह अच्छा फ़ैसला है. मैं इस फ़ैसले से खुश हूं. मुझे लगता है कि राज्य सरकार और पुलिस दोनों ही इस गुनाह में शरीक हैं. गुनाहगारों को रेप और लूट-खसोट करने की पूरी छूट मिली हुई थी. कोर्ट ने पुलिस और डॉक्टर दोनों को दोषी बताया है. अब मुझे लग रहा है कि मुझे न्याय मिल गया है. उम्मीद है अब मुझे शांति मिल सकेगी. इंसाफ की यह लड़ाई लंबी और भयावह थी, लेकिन मैंने इस लड़ाई को छोड़ने के बारे में कभी भी नहीं सोचा. पुलिस और प्रशासन ने हमें रोकने के लिए सब कुछ किया. डराया-धमकाया, सबूत मिटाए, मारे गए लोगों को बिना पोस्टमार्टम के दफ़ना दिया. डॉक्टरों ने यहां तक कहा कि बिलकीस बानो का रेप नहीं हुआ था. मुझे जान से मारने की धमकी भी मिली.


इंसाफ की इस लड़ाई में मेरा परिवार बर्बाद हो गया. मुझे और मेरे पति याकूब रसूल को अपने पांच बच्चों के साथ गुजरात और गुजरात के बाहर 10 बार घर बदलना पड़ा. हम अब भी घर नहीं जा सकते हैं क्योंकि हम डरे हुए हैं. पुलिस और प्रशासन ने हमेशा हम पर अत्याचार करने वालों का साथ दिया है. जब हम गुजरात में होते हैं तो अब भी अपने चेहरे ढंक कर रखते हैं. हम कभी भी अपना पता किसी को नहीं देते हैं.

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2002 में हुए गुजरात दंगों में 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे. इनमें से ज्यादातर मुस्लिम थे. इन दंगों की शुरुआत गोधरा में 60 हिंदू तीर्थ यात्रियों की मौत के बाद हुई थी. उनकी मौत साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आग लगने के कारण हुई थी. ट्रेन में आग लगने के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहराया गया. इसकी प्रतिक्रिया में हिंदुओं की भीड़ ने गुजरात के कई शहरों में मुसलमान आबादी पर हमला कर दिया. तब मैं 19 साल की थी और तीन साल की एक बेटी की मां थीं. मेरा दूसरा बच्चा होने वाला था.

मैं अपने मां-बाप के घर रंधिकपुर गई हुई थीं जो गोधरा के पास ही है. ट्रेन में आग लगने के बाद की अगली सुबह थी. मैं रसोई में थी और दोपहर का खाना बना रही थी. तब तक मेरी चाची और उनके बच्चे दौड़ते हुए आए. वो चिल्लाते हुए कह रहे थे कि उनके घर में आग लगा दी गई है. हमें जल्दी से जल्दी घर छोड़कर भागना पड़ेगा. हमने जो कपड़े पहन रखे थे, उन्हीं कपड़ों में हम बिना समय गंवाए भागे. यहां तक कि हमारे पास चप्पल पहनने तक का समय नहीं था. कुछ ही मिनटों में आस-पास के सभी मुसलमान परिवार अपने घरों को छोड़कर सुरक्षित स्थान की तलाश में भाग खड़े हुए थे.

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मैं अपने परिवार के 17 लोगों के साथ थीं. मेरे साथ तीन साल की मेरी बेटी, एक गर्भवती चचेरी बहन, उनके छोटे भाई-बहन, भतीजियां और भांजे, और दो वयस्क पुरुष थे. हम सबसे पहले गांव के सरपंच के पास सुरक्षा के लिए गए, लेकिन जब भीड़ ने सरपंच को भी मारने की धमकी देने लगे तो हम गांव छोड़ने पर मजबूर हो गए. अगले कुछ दिनों तक मैं अपने परिवार के साथ गांव दर गांव भटकती रहीं. कभी मस्जिदों में तो कभी किसी हिंदू परिवारों के रहमो-करम पर हम भटकते रहे. ऐसे ही समय बीतता गया. तीन मार्च की सुबह जब हम बगल के एक गांव में जाने की तैयारी में थे. तब दो जीपों में सवार कुछ लोग आ धमके और हम पर हमला कर दिया.

उन्होंने हमारे ऊपर तलवार और डंडों से हमला कर दिया. उनमें से एक ने मेरी बेटी को मेरी गोद में से छीन लिया और उसे ज़मीन पर पटक दिया. वो सिर के बल पत्थर पर जाकर गिरी. हम पर हमला करने वाले 12 लोग गांव के ही पड़ोसी ही थे. मैं हर रोज उन्हें देखते हुए पली-बढ़ी थीं. उन लोगों ने महिलाओं के कपड़े फाड़ दिए और कई उनके साथ बलात्कार करने के लिए आगे बढ़े. मैं उनसे रहम की भीख मांगती रहीं. उन लोगों से कहती रही कि मैं पांच महीने की गर्भवती हूं लेकिन उन लोगों ने एक नहीं सुनी. मेरी बहन जिसने भागने से दो दिनों पहले ही एक लड़की को जन्म दिया था, उसके साथ बलात्कार किया गया और उसकी हत्या कर दी गई. उसके नवजात बच्चे को भी मार दिया गया.

मैं जिंदा बच गईं क्योंकि मैं बेहोश हो गई थीं और हमलावरों ने मुझे मरा हुआ समझकर छोड़ दिया था. जब मैं होश में आई तो ख़ुद को खून में सने पेटीकोट से ढँका और नज़दीक की एक पहाड़ी पर किसी तरह पहुंचीं. वहां मैं एक गुफा में छिप गई. अगले दिन मुझे जब बहुत जोर की प्यास लगी तो मैं नीचे उतर कर एक आदिवासी गांव में पहुंची. पहले तो गांव वालों ने मुझे शक की नज़र से देखा और डंडों के साथ आए, लेकिन फिर मेरी मदद की. उन्होंने मुझे एक ब्लाउज दिया और शरीर ढकने के लिए दुपट्टा दिया. वहां एक पुलिस जीप दिखी. गांव वाले मुझे पुलिस स्टेशन ले गए जहां मैंने पुलिस के सामने आपबीती सुनाई.

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मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं इसलिए पुलिसवालों को कहा कि वो मेरी शिकायत पढ़ कर सुनाएं लेकिन उन्होंने सुनाने से मना कर दिया और मेरे अंगूठे का निशान ले लिया. उन्होंने अपनी मर्जी से जो चाहा, लिखा. मैं सभी दंगाइयों को जानती थी. मैंने पुलिस को उनके नाम बताए थे लेकिन पुलिस ने किसी का नाम नहीं लिखा. अगले दिन मुझे गोधरा के एक कैंप में भेज दिया गया. वहां मेरी मुलाकात अपने पति से हुई. हम उस कैंप में अगले चार-पांच महीने तक रहे.

मैं बदले में यकीन नहीं रखती. निर्भया की तरह मेरा मामला भी भयावह था. लेकिन मैं किसी की ज़िंदगी लेने में यक़ीन नहीं रखती. मैं उनके लिए मौत की सज़ा नहीं चाहती. मैं चाहती हूं कि वो पूरी ज़िंदगी जेल में बिताए. मैं उम्मीद करती हूं कि एक दिन उन्हें अपने गुनाहों का अहसास होगा कि कैसे उन्होंने छोटे-छोटे बच्चों को मारा और औरतों के साथ बलात्कार किया. मैं बदला नहीं लेना चाहती. मैं चाहती हूं कि उन्हें अहसास हो कि उन्होंने क्या किया है. (बीबीसी हिंदी पर प्रकाशित इंटरव्यू के संपादित अंश, साभार)
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