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साइंस के गुरूजी को ओपन लेटर, आप गलत थे, देश को यूनिवर्सिटी की नहीं गौशाला की जरूरत है

-सुबोध राय

गौमूत्र और गोबर की अनंत संभावनाओं पर वाट्सअप यूनिवर्सिटी ऑफ सोशल एंड प्रोपेगेंडा साइंस में इन दिनों निरंतर रिसर्च कर रहा हूं। आप कहते थे मेरे दिमाग में गोबर भरा है तब बुरा लगता था। लेकिन मुझे क्या पता था आपने मेरे दिमाग में भरे चमत्कारी रसायन को तभी सूंध लिया था। गुरू जी आप जिंदगी भर न्यूटन से लेकर आइंस्टीन के चक्कर में पड़े रहे। उनके नाम पर बेवकूफ बनते रहे बनाते रहे।

आप वामपंथी साजिश के शिकार थे नहीं तो आपको पता होता मोर बाल ब्रह्मचारी होकर भी पिता बन सकता है। मंत्रों के चमत्कार से सर्जरी संभव है। गोबर देह में लपेटकर  परमाणु विकिरण की ऐसी तैसी की जा सकती है। गुरू जी जब से चमत्कार की शरण में आया हूं लोड कम हो गया है। अब सोचना नहीं पड़ता की क्या सोचूं। पीएम की तरह मैं भी भूल चुका हूं कि मेरी डिग्री ब्रह्मांड के किस कोने में रखी है।

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सुनो गोभक्तों, विश्वगुरुओं और दो पाया जानवरों, मैं तुम्हारी 'गऊ माता' बोल रही हूं 

अब मैं स्वयं वैज्ञानिक भी हूं और अर्थशास्त्री भी। ज्ञान का आदि भी हूं और अंत भी। तर्क वितर्क करने वालों को गाली जैसी गैरमामूली संस्कारी शब्दावलियों से चुप करा देता हूं। सत्ता में बैठे तमाम महानुभावों की तरह मैंने भी मान लिया है देश को यूनिवर्सिटी की नहीं गौशाला की जरूरत है। राष्ट्र को प्रोफेसरों की नहीं गौरक्षकों की जरूरत है। रोजी रोटी से ज्यादा देश को अलंकारी भाषणों की जरूरत है। गुरू जी गुरू दक्षिणा वाली बात ये कि मौका है चोला बदल लीजिए मौज में रहेंगे मेरी तरह।

आपका अप्रिय छात्र 
नागेश्रर संघी
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