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मोदी जी, बंकर ध्वस्त करने वाले चीन से बात कर सकते हैं तो कश्मीरी नेताओं से क्यों नहीं?

-कृष्णकांत

आदरणीय प्रधानमंत्री जी, 
चीन ने भारत के कुछ बंकर ध्वस्त कर दिए थे. लेकिन अखबारों से सुना कि आपकी शी जिनपिंग से मुलाकात बड़ी अच्छी रही. दोनों ने एक दूसरे की तारीफोें की तवारीख लिखी, प्रशंसा के पुल बांधे, बड़ाई के बांध बनाए, सराहना की सड़क बनाई. मतलब बड़ा याराना लगा. तो दोनों देशों की जनता ने क्या बिगाड़ा है. या तो तनाव झूठ है, या फिर ​मुलाक़ात. सही सही बताइए चल क्या रहा है? 

वैसे पाकिस्तान से भी कुछ ऐसा ही चल रहा है. न मुहब्बत हो रही, न लड़ाई. आप बिरयानी भी खा आए, आम और साड़ी भी भिजवा दी. सर्जिकल स्ट्राइक भी कर दी. लेकिन सच ये है कि 2016 में आठ साल बाद सर्वाधिक सैनिकों ने शहादत दी. सर्जिकल स्ट्राइक पर आप चुनाव लड़कर जीत गए, लेकिन शहादतों का कोई नामलेवा नहीं.

लार्ड मेघनाद देसाई ने मजाक में लिखा था कि पाकिस्तानी को कश्मीर मिल जाए तो वह दोबारा टूट जाए. पाकिस्तान के हुक्मरान कश्मीर के नाम पर पाकिस्तान को एक रखते हैं, उसी नाम पर चुनाव जीतते हैं. वह भारत के प्रति उन्माद से जिंदा है. आप भारत को वैसा ही क्यों बनाना चाहते हैं?

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2013 में कश्मीर में मिलिटेंसी एकदम नि​ष्प्रभावी हो गई थी. शांति थी. क्या हुआ कि आज कश्मीर जलता रहता है. आप बंकर ध्वस्त करने वाले चीन के प्रमुख से बात कर सकते हैं तो कश्मीरी नेताओं से क्यों नहीं कर सकते? कश्मीर के अलगाववादियों से कोई बात क्यों नहीं करते? सरकार बना ली, मकसद पूरा हो गया क्या? ये गलत बात है. कुशल नेता वो है जो हर तरह की जनता को राष्ट्र की बात पर अपने साथ रखे, भले वह उससे असहमत हो. कश्मीरियों से बात तक नहीं होती, लेकिन पूर्वोत्तर के उग्रवादियों से बात होती है, चीन से बात होती है, कश्मीर हमारा है तो कश्मीर के लोग क्यों पराए हैं? कुछ झोल नजर आता है. 

एक बात और कहनी थी. हमें पिछले दस साल अच्छे से याद हैं, एक एक सफ़हा. हम लोग जब पढ़ाई करते थे, फिर नौकरी में आए, तब अखबारों के संपादकीय भारत की प्रगति से भरे होते थे. भारत तीसरी महाशक्ति, भारत स्पेस में फलां, परमाणु में फलां, आर्थिकी में फलां. वह सब कहां गया? उससे युवाओं को उर्जा मिलती थी. 

अब के अखबार और चैनल गाय, गोबर, गोमूत्र, गोरक्षा, गोसेवा, गोपालन और गोआंतक, हिंदूवाद, हिंदू राष्ट्र, हिंदू प्रलाप से भरे होते हैं या फिर आपकी तारीफ से. मनमोहन भी देश के प्रधानमंत्री थे, आप भी हैं. दोनों में से किसी ने मेरी भैंस नहीं खोली, लेकिन अंतर बता रहा हूं. आप खुद सोच कर देख लें. 

सबसे जरूरी जानते हैं क्या है? देश के नेतृत्व का सुलझा हुआ होना. आप देश में रहें या विदेश में, आप लोगों की सोच, उनकी दिनचर्या, उनका रोजगार, उनकी जीवन शैली तय करते हैं. हर प्रधानमंत्री करता है. मनमोहन का दौर आपके दौर से इस मामले में अलग था कि वे सकारात्मकता का भाषण नहीं देते थे. वे स्पीच गुरु बनकर मन की बात नहीं करते थे, लेकिन सकारात्मकता ज्यादा थी. आपका भाषण तगड़ा है, लेकिन उसका असर उल्टा है. आपके बाद सब आपस में लड़ रहे हैं. हिंदू मुस्लिम, हिंदू हिंदू, दोस्त दोस्त, भाई भाई. मनमोहन ने कोई नारा नहीं दिया, लेकिन कोई नहीं लड़ा.

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कहा गया था कि मनमोहन सिंह भ्रष्ट हैं, भ्रष्ट सरकार चलाते हैं. आपने कुर्सी संभालने के बाद उनको या उनके किसी सहयोगी को जेल नहीं भेजा. मतलब सब झूठ था. पूरे देश को मूर्ख बनाया गया. लेकिन कोई बात नहीं. हो सकता है लोग समझ जाएं कि उनको छोटी गंगा बोलकर नाले में कुदाया गया. 

अच्छा काम हो न हो, घिनौने काम नहीं होने चाहिए. कसम से बता रहे, सिर्फ नुकसान होता है. जैसे गाय प्यारा जानवर है. उसके नाम पर धंधा घिनौना काम है. राम इस देश की आस्था हैं. उनके नाम का गोरखधंधा घिनौना काम है. यह सब सिर्फ नुकसान करता है. हमारा, आपका, जनता का यानी सबका.

हम जानते हैं कि हमारा भारत गाय और राम से प्यार करता है, लेकिन हमारा भारत ही है जो अल्लाह, यीशू, बुद्ध आंबेडकर, गांधी से भी प्यार करता है. यह देश महान है. मैं इसके जीतने की उम्मीद करता हूं. यह गाय से भी प्यार करेगा, राम से भी, अल्लाह से भी, यीशू से भी, बुद्ध से भी, महावीर से भी. हर महात्मा से, हर देवता से. आदि देव से भी और पीपल के पेड़ से भी. 

नफरत और झूठा का एक दिन नाश हो जाएगा. उस दिन हिंदुस्तान जीत जाएगा. 

ख़ैर, उम्मीद है आपकी यात्रा सफल रही होगी. 

हृदय से आपके अपने देश का  
एक शुभाकांक्षी नागरिक
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