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'खुद को सच का सिपाही बताने वाले सुशांत सिन्हा का वो दोहरा चेहरा मेरे लिए शॉकिंग था'

-कुंदन शशिराज

एक एक्टर cum एंकर सिन्हा साहब इन दिनों चिट्ठी लिखकर अचानक बड़े क्रांतिकारी बन गए हैं... उनकी चिट्ठी रवीश के दोहरेपन को उजागर करने का दावा करती है... सिन्हा साहब की चिट्ठी कई लोगों के लिए रवीश पर अपनी अंदरूनी भड़ास निकालने का माध्यम बन गई है... लेकिन ये चिट्ठी पढ़ते ही मुझे बेतहाशा हंसी आई और 9 साल पुरानी एक घटना याद आ गई।

2008 में मेरी शादी हुई थी और इसी शादी के दौरान में अपने एक पुराने दोस्त से पटना में मिला जो 2002 में मेेरे साथ दिल्ली के एक प्रोडक्शन हाउस में वीडियो एडिटर हुआ करता था, लेकिन कुछ पारिवारिक वजहों से वो बाद में दिल्ली छोड़कर पटना चला गया था। 6 साल बाद जब मेरा दोस्त मुझसे मिला तो उसने मुझसे इच्छा जाहिर की कि अब वो दोबारा दिल्ली लौटकर एडिटिंग में अपना करियर बनाना चाहता है।

मैंने उससे पूछा कि दिल्ली में किसी को जानते हो तो उसने तपाक से सिन्हा साहब का नाम लिया। सिन्हा साहेब तब के जनमत (जो बाद में LIVE INDIA बना) एंकर हुआ करते थे। मैंने कहा कि भाई वो एक नेशनल न्यूज़ चैनल में टॉप का एंकर है वो तुम्हारी मदद क्यों करेगा भला। तो मेरे दोस्त ने पूरे भरोसे के साथ जवाब दिया कि क्यों नहीं करेगा भाई, दोस्त है अपना।

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मैंने आश्चर्य के साथ उससे पूछा - अच्छा कैसे ? तो उसने बताया कि पटना में चलने वाले जिस लोकल केबल न्यूज़ चैनल NEWS LINE में मिस्टर सिन्हा एंकरिंग सीख रहे थे, वहां वो सीनियर वीडियो एडिटर था और एंकरिंग सीखने के दौरान सिन्हा साहेब की हमारे एडिटर दोस्त से खूब छनती थी। सिन्हा साहेब और हमारे एडिटर दोस्त का साथ खाना पीना और साथ ही ऑफिस आने जाने का सिलसिला भी था।

फिर भी मैंने कहा कि वो सब तो ठीक है, लेकिन दिल्ली आने के बाद क्या तुम्हारी कभी उनसे बात हुई है, लंबा वक्त हो चुका है हो सकता है वो तुम्हें भूल गया हो। मेरे दोस्त ने पूर्ण आत्मविश्वास के साथ कहा कि दिल्ली जाने के बाद भी उसकी कई बार सिन्हा से बात हुई है और सिन्हा उसे भूला नहीं है और उससे उसने कहा है कि जब भी आप दिल्ली आएं मुझे बताएं मैं आपकी मदद जरूर करूंगा।

मैंने कहा - ऐसा है तो बहुत अच्छा है। शादी संपन्न हुई। मेरी पत्नी पटना में ही कुछ दिनों के लिए रूकी और मेरा एडिटर दोस्त ये कह कर मेरे साथ ही दिल्ली आ गया, चलो जब तक भाभी नहीं आ जाती वो मेरे घर पर ही रूककर अपनी नौकरी का जुगाड़ कर लेगा। मेरा एडिटर दोस्त मेरे घर पर रूका और फिर उसने दिल्ली आते ही मिस्टर सिन्हा के नंबर पर फोन मिलाया। सिन्हा जी ने फोन उठाया और गर्मजोशी के साथ दोनों की बातचीत का मैं भी गवाह बना। इसके बाद मेरे दोस्त ने उन्हें बताया कि वो अब दिल्ली आ चुका है और वो (सिन्हा) चूंकि एक अच्छे चैनल में अच्छी पोजीशन पर है लिहाजा अगर एडिटिंग में वो कुछ रेफरेंस वगैरह दे सके तो उसके लिए अच्छा होगा। सिन्हा जी ने फोन पर दिलासा दिया कि हां हां कुछ करते हैं... जल्दी ही मिलते हैं।

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इसके बाद की स्टोरी एकदम छोटी है। पहली बातचीत के बाद मेरे दोस्त की सिन्हा साहब से दोबारा कभी बात ही नहीं हो पाई। पहले तो कई बार फोन पूरा रिंग हुआ लेकिन उठा नहीं... बाद में फोन पर रिंग जानी भी बंद हो गई। एक दिन... दो दिन... चार दिन .. छह दिन बीत गए.. लेकिन ना सिन्हा साहब की तरफ से कोई कॉल आई और ना ही मेरे दोस्त का फोन उठा।


मैं तो पहले ही समझ चुका था.. लेकिन मेरे दोस्त को सच्चाई समझने मे करीब एक हफ्ते का वक्त लग गया। बाद में मैंने कोशिश की और भगवतकृपा से उसकी मेरे तत्कालीन चैनल (MH1 NEWS) में वीडियो एडिटर की नौकरी दो दिन के भीतर ही लग गई।

सवाल ये नहीं है कि सिन्हा साहब ने अपने पुराने एडिटर दोस्त की नौकरी क्यों नहीं लगवाई.. ये माना जा सकता है कि अंदरूनी तौर पर उनकी पोजीशन उस वक्त उतनी स्ट्रांग ना रही हो, लेकिन खुद को सच का सिपाही बताने वाले सिन्हा साहेब ने जिस तरह अपने एक पुराने दोस्त को सच बताने के बजाय ignore किया और अपना अजीबोगरीब दोहरा चेहरा दिखाया, वो मेरे लिए भी Shocking था।

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ना मैं सिन्हा को पहले व्यक्तिगत तौर पर जानता था.. ना जानता हूं और ना आगे जानने का वक्त है मेरे पास.. लेकिन, हवा का रूख देख पहचानकर स्ट्रैटजी के साथ आगे बढ़ने की इनकी बुद्धिमता की काफी "तारीफें" मैंने पहले भी सुन रखी हैं, लिहाजा मुझे इनकी ताजा चिट्ठी पढ़कर कोई आश्चर्य नहीं हुआ.. लेकिन बरबस ही ये 9 साल पुरानी कहानी अचानक याद हो आई ! [अगर आप भी लिखना चाहते हैं कोई ऐसी चिट्ठी, जिसे दूसरों तक पहुंचना चाहिए, तो हमें लिख भेजें- merekhatt@gmail.com. हमसे फेसबुकट्विटर और गूगलप्लस पर भी जुड़ें]

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