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मुजफ्फरपुर कांड पर नीतीश को तेजस्वी की चिट्ठी, खेलने की उम्र में वो खिलौना बन गईं

आदरणीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी,

मुज़फ्फरपुर बालिका गृह बलात्कार कांड पर आपकी महीनों की रहस्यमयी चुप्पी देखकर यह खुला पत्र लिखने पर विवश हुआ हूं. यह विशुद्ध रूप से ग़ैर-राजनीतिक पत्र है क्योंकि एक सामाजिक कार्यकर्ता होने से पहले मैं सात बहनों का भाई, एक मां का बेटा और कई बेटियों व भगिनी का चाचा और मामा हूँ. बच्चियों के साथ हुई इस अमानवीय घटना से मैं सो नहीं पाया हूं. आप कैसे चुप रह सकते हैं, यह आपसे बेहतर कौन जानता होगा?


मैं दुःखी हूं क्योंकि जिनकी खिलौनों से खेलने की उम्र थी, वो खिलौना बन गईं. चलो मान भी लें कि वो बेटियाँ थीं, पर वो हमारी बेटी थोड़ी ना थी, अनाथ थी, बेसहरा थी, अभागी थी, मजबूर थी, वो जो भी थी पर हमारी लाड़ली बेटी थोड़ी ना थी. हम क्यों बोलें? वो हमारी कुछ नहीं लगती थीं. उनके पीछे कोई गाँव, पंचायत, समाज और पार्टी नहीं है क्योंकि वो बेसहारा हैं.

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वो अनाथ मासूम लड़कियां किसी का वोट बैंक नहीं हैं इसलिए हमें क्या लेना देना? उनसे हमारा कोई रिश्ता थोड़े ना था,  वह लुटती रहीं, पिटती रहीं, शर्मसार होती रहीं, बेइज्जत होती रहीं, रोती रहीं, कराहती रहीं, चीख़ती रहीं, मरती रहीं. वो हवस के पुजारियों के हाथों हर रात लुटती रहीं और सरकार गहरी नींद में सोती रही.

क्या वो बेटियां नहीं थीं? या उन्हें इस धरती पर केवल शोषण के लिए ही लाया गया था? हर जगह से लुटी-पिटी ये बेटियां जब सरकार के पालने में आई थीं तो उन्होंने खुद को महफूज समझा होगा, सुरक्षित समझा होगा, सोचा होगा कि वो अब सही जगह आ गई हैं, यहां उनका पालन पोषण होगा, सम्मान और आसरा मिलेगा, प्रेम करुणा और ममता प्राप्त होगी. लेकिन हुआ क्या? उन्हें मिला क्या? उन्हें सरकार समर्थित, संरक्षित और संपोषित हैवान ही नोचते रहे.

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आपकी सरकार के संरक्षण में उनका ऐसा शोषण हुआ जिसे सोच कर रूह कांप जाती है. अब आप कहेंगें कि बिहार सरकार के संरक्षण में कैसे यह हुआ तो एक बार जरा गौर से उस बालिका गृह का बोर्ड देख लीजियेगा. उसके सबसे ऊपर लिखा है ‘बिहार सरकार’ उसके नीचे लिखा है ‘समाज कल्याण विभाग’, उसके नीचे लिखा है ‘राज्य बाल संरक्षण समिति’ तब जाकर लिखा है बालिका गृह. मैं यह नहीं कहता कि वह बालिका गृह किसी ब्रजेश ठाकुर का था मैं तो यह कहता हूं कि वह बालिका गृह बिहार सरकार का था जिसके मुखिया नीतीश कुमार जी हैं. बलात्कार पीड़ित बच्चियों का आरोपी ब्रजेश ठाकुर अपनी गिरफ्तारी के बाद भी बेशर्मी से हंस रहा है, क्योंकि वह जानता है कि उसने जिसकी-जिसकी सेवा की वह सब खुद को बचाने के लिए उसको बचाएंगे.

क्या यही सुशासन है जहां पुलिस प्रशासन ने आंखें मूंद ली थी? यह समाज और सरकार का सबसे घिनौना, सबसे गंदा चेहरा है. ऐसा चेहरा जिसके बारे में सोचकर ही दिल दहल जाए,  जिसके लिए शब्द नहीं मिल रहे. क्या हमारा समाज इतना मर गया है कि एक शेल्टर होम की चारदीवारी में सालों से छोटी बच्चियों के साथ यौन दुराचार और बलात्कार हो रहा हो और कोई उससे आंखें चुराकर बैठ सके.

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वो बेटियां क्या बिहार की अमानत नही हैं? अगर वर्तमान बिहार सरकार की जिम्मेदारी नहीं है तो न ले क्योंकि हम उसे मुर्दा मान चुके हैं, जिनका जमीर ही मर चुका हो वो जिंदा रह कर भी क्या करेगा? क्या उन बच्चियों की अस्मिता हमारी अस्मिता नहीं है? उनका दर्द उनकी तकलीफ़ हमारी तकलीफ़ नहीं है? क्या उनके प्रति हम सबकी कोई जिम्मेदारी नही है? उनके आँसुओं का क़र्ज़ हम पर नहीं है? क्या उन्हें न्याय दिलाने के लिए हमारी आवाज़ नहीं गूंजेगी? उनके गुनहगारों को सज़ा दिलाने की लड़ाई लड़ने की ताक़त हम में नहीं है? या हम महज़ मुर्दा ज़मीर, अंधी अंतरात्मा और गूंगी मर्दानगी का कंकाल हैं?

सोच कर दिल भर आता है, आंखें नम हो जाती हैं, कि छोटी-छोटी मासूम बच्चियों के साथ  कैसा-कैसा अमानवीय और राक्षसी व्यवहार किया गया, कैसी कैसी हैवानी प्रताड़नाएं दी गयीं, “अंकल अंकल हमें तकलीफ़ हो रही“ “मत मारो हमें” तड़पती, छटपटाती, गिड़गिड़ाती उन बेटियों पर क्या बीती होगी इसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है, वो नन्ही-नन्ही बेटियां जो हर पुरुष में अंकल, भैया, चाचा, मामा देखती थीं, जिस घर को वह अपना मंदिर, अपना आशियाना, अपना घर समझती थीं, जहां आसरे की उम्मीद थी उसी घर की छत के नीचे उन अभागी बेटियों के साथ उनके पालनहारों ने हर रोज बलात्कार किया, हैवानों ने उनकी इज़्ज़त तार-तार की, लगातार बार-बार उनका तिरस्कार होता रहा,  शारीरिक के साथ-साथ मानसिक शोषण किया गया. भावनात्मक रूप से टूटी हुई इन बच्चियों को और तोड़ने का प्रयास किया गया. भूखा प्यासा रख कर बलात्कार किया गया.

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7 से 14 साल की बेटियों को गर्भवती कर दिया गया और तीन बेटियों का गर्भपात भी कराया गया. एक सात साल की मूक-बधिर बेटी ने बताया कि उसके हाथ-पैर बांध कर रेप किया जाता था और जब वह विरोध करती तो उसे तीन-तीन दिन तक भूखा रखा जाता था और डंडे से उसकी बेरहमी से पिटाई की जाती थी. किताबों और खिलौनों से खेलने की उम्र में इन बच्चियों की आबरू, अस्मिता और इज़्ज़त से खेलने वाले पापियों को इन बच्चियों के साथ हुए पापों का हिसाब देना ही होगा. बिहार का विपक्ष जिंदा है. वह अपनी पूरी अंतरात्मा और ताकत से बिहार की इन बेसहारा बेटियों के साथ एक परिवार की तरह खड़ा है और हर क़दम पर खड़ा रहेगा. तब तक खड़ा रहेगा जब तक कि उन्हें न्याय नही मिल जाता.

मुज़फ़्फ़रपुर बालिका गृह की यह घटना मानवीय इतिहास में अब तक की सबसे क्रूरतम और शर्मनाक घटना है. संस्थागत रूप से इतना सब कुछ होता रहा लेकिन सरकार के एक भी तंत्र या सूत्र के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी. एक प्राइवेट संस्थान ने जब इसकी रिपोर्ट दी तो 55 दिनों तक कोई कार्रवाई ही नहीं की गई. नीतीश जी आप सचमुच बधाई के पात्र हैं, आपने कितना बढ़िया काम किया है ! इन बेटियों को न्याय दिलाने के बजाय जिस दिन संस्था पर एफआईआर होती है उसी दिन आपकी सरकार उसे एक और टेंडर दे देती है. 55 दिनों से धूल फांक रही फाइल की गंध क्या आप तक नही पहुंची थी?

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जब हमने सदन में मामला उठाया तो आपके संसदीय मंत्री ने सदन को गुमराह किया. क्या आपके अधिकारियों ने यह नहीं बताया कि वह एफआईआर दर्ज करने जा रहे हैं? किस मदहोशी में आपकी सरकार काम कर रही है? मुख्य आरोपी का तो नामज़द प्राथमिकी में नाम भी नहीं है. इतने बड़े अपराध के आरोपी को आप की सरकार पुरस्कृत कर रही है. आप और आपकी सहभागी पार्टी पूरे देश में बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ का नारा गला फाड़-फाड़ कर चिल्ला रही है, आप लोगों को तो इस घटना को “राष्ट्रीय शर्म” घोषित कर देना चाहिये था.

तत्काल आपको सीबीआई जांच का आदेश देना चाहिये था, लेकिन स्वयं आप और आपके पुलिस महानिदेशक कहते रहे कुछ नहीं हुआ, हम केस सुलझाने में सक्षम हैं. बिहार जानता है आप और आपकी पुलिस सबूत मिटाने की उस्ताद है. आप किसके इशारे और दबाव में उसके अख़बार को करोड़ों का विज्ञापन देते रहे? किसके दबाव में आपने उसे अपने अधीन पीआरडी विभाग की प्रेस अक्रेडिटिंग कमेटी का सदस्य बनाया था? उसकी सरकार से क्या मिलीभगत थी कि सरकार का पैसा उसके सभी एनजीओ को मिलता था? क्या सही नहीं है उसके आपकी पार्टी और सरकार में उच्च पदों पर बैठे सफ़ेदपोशों से गहरे संबंध है? क्या यह सही नहीं हैं वो अपने चुनावी मंच का संचालन करता था और आप उसके घर भोज पर जाते थे? कितना कुछ बताऊं, आप स्वयं तो सब अंदर-बाहर का जानते ही हैं.

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बेटियों को सांत्वना देनी चाहिये थी, पर आपने आपराधिक चुप्पी साध ली. आप के लोग आरोपियों को बचाने और पुरस्कृत करने में लिप्त हो गये. आप लोगों का दोहरा चरित्र पूरा देश देख रहा है. खैर देर से ही सही आपने सीबीआई जांच का आदेश तो दिया है, कुछ न्याय की उम्मीद पीड़िताओं को बंधी होगी.

एक जागरूक आम नागरिक होने के नाते मेरी आप से यह मांग है और यह मांग उन सब देशवासियों की है जो अपनी मां, बहन, बेटी तथा मातृभूमि का सम्मान करता है. इस घटना के आरोपियों को आरोप सिद्ध होने पर फांसी से कम सजा न मिले और ऐसी घटना बिहार मे दोबारा न होने पाये, नहीं तो बिहार मे बेटियों को पैदा करने से लोग डरेंगें.

आप बिहार के मुखिया हैं. प्रदेश में किसी भी प्रकार के संकट में बिहार की जनता आपकी क्रिया देखती है लेकिन ऐसे घिनौने कृत्य पर आपकी घोर चुप्पी आप पर सवाल खड़े करती है. प्रदेश के मुखिया के तौर पर आपकी भूमिका संदेहास्पद है. आपको बेटियों के लिए अपना मुंह खोलना होगा. उन्हें सुरक्षा और आत्मसम्मान के साथ जीने का आश्वासन देना होगा. आप ऐसे गूंगे नहीं बन सकते. पत्थर दिल मत बनिए. अगर प्रदेश नहीं संभल रहा तो इस्तीफ़ा दीजिए क्योंकि बिहार की न्यायप्रिय जनता और संस्थागत सामूहिक बलात्कार की घटनाएं ना ही देखना चाहती हैं और ना ही सुनना. अगर आपमें ज़मीर बचा है तो बोलिए.

जय मातृ शक्ति
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