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प्यार का पहला ख़त, तुम्हें देखने के बाद तो मेरा जीना ही मुश्किल हो गया है !

- अतुल कुमार पांडेय

ज़िन्दगी के कई शेड हैं. कभी ख़ुशी है, कभी गम, कभी नाराज़गी तो कभी कॉमेडी. अंशुमन जब छोटा था, तभी माँ-बाप गुज़र गए. जवान हुआ तो उसका पालन-पोषण करने वाले पिता-तुल्य बड़े भाई की मृत्यु हो गयी और जिस लड़की से प्यार किया उसकी शादी किसी और से हो गई. उसे लगता था की वह जिसके जीवन में आया, उसकी खुशियाँ छीन ली. बड़े भाई ने उसे पढ़ाने के लिए खुद पढाई छोड़कर नौकरी की और अपने सपने कभी पूरे नहीं कर पाए. भाभी विधवा हुई तो उनकी दिमागी हालत ठीक नहीं रहती और भतीजी को माँ-बाप का प्यार नहीं मिल पाता.

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आज अंशुमन के पास अच्छी जॉब है, बैंक बैलेंस है, बंगला है, गाड़ियाँ हैं, क्रेडिट कार्ड है, सब कुछ है पर नहीं है तो ख़ुशी नहीं है. हर पल कुछ कचोटता रहता है. सम्पूर्णता आती नहीं और अपूर्णता अन्दर ही अन्दर खाए जाती है.

बारह जनवरी की रात ग्यारह बजे, जब अंशुमन घर में बैठा सिगरेट फूंकता हुआ लैपटॉप पर ईमेल चेक कर रहा था, मोबाइल पर एक कॉल आया. साधारण कॉल नहीं था, अर्चना के पिता का था. अर्चना अपनी ज़िन्दगी की आखिरी सांसें गिन रही थी. ये वही अर्चना थी जिसके संग जीने-मरने की कसमें कभी अंशुमन ने खाई थी. कभी अपने हाथों से लिखा प्रेम-पत्र उसे देते हुए उसका बदन हया और डर के मारे सुर्ख हुआ था. कभी उसी की विदाई में वह फूट-फूट कर रोया था.

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उसने अगली सिगरेट जलाई और फिर अगली. यादें जब बार-बार आती हैं तो अजीब सी तुष्टि प्रदान करती हैं. अंशुमन सोचने लगा. वह एक शादी का अवसर था जब उसे पहली बार देखा था, स्टेज पर दुल्हन के साथ. दुल्हन अर्चना की बड़ी बहन थी और अर्चना हमेशा उसके साथ-साथ रही थी. अंशुमन ने एक दोस्त से पूछा कि ये कौन है तो उसने बताया की ये शर्मा अंकल की दूसरी बेटी है. फिर तो कभी आमने-सामने, कभी छुप-छुपाकर उसने न जाने अर्चना को कितनी बार देखा और हर बार वह पहले से ज्यादा खूबसूरत नज़र आई. शादी से लौटने के बाद नींद गायब थी और ख्यालों पर अर्चना का एकाधिकार हो चुका था. मोहब्बत नज़र का खेल है, कहाँ देखने मात्र से हो जाता है, कहाँ बरसों साथ रहकर भी नहीं होता!

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दूसरी बार वह एक मॉल में दिखाई दी जहाँ वो अपनी सहेलियों के संग थी और अंशुमन अपने एकलौते दोस्त माजिद के साथ. चलते-चलते एकबार तो दोनों आमने-सामने हो गए और अंशुमन फ्रीज हो गया था. सेकंड के हजारवें हिस्से में उसका शरीर कई डिग्री गर्म हो गया था और अजीब सा कम्पन आ गया था. अर्चना ने कहा ‘एक्सक्यूज मी’ और वह साइड हो गया. तब अंशुमन ने नहीं सोचा था की कोई फ़ोन पर कभी कहेगा की अर्चना मरने वाली है जल्दी आ जाओ.

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माजिद परिपक्व सोच का लड़का था और इश्क में पड़ने की सलाह नहीं दे सकता था, पर सच्चे प्यार को आँखों में देखकर पहचानने से इनकार भी नहीं कर सकता था. वादा किया कि बात करूँगा. कोशिश भी की. लेकिन खूबसूरती भी बड़ी पावरफुल होती है. माजिद पास भी नहीं फटक पाया और अंशुमन के लिए दुनिया की सारी घड़ियाँ वहीँ रुकी रहीं.

भावना जब हद से बढ़ जाती है तो साहस को जन्म देती है. अंशुमन ने एक ख़त लिखा. ख़त नहीं, दुनिया के सबसे मासूम और पवित्र भावनाओं का पुलिंदा था. जिस ख़त में सारी ज़िन्दगी किसी और के नाम लिखी हो, ऐसा ख़त साधारण नहीं, रूहानी था.

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माजिद ने मिलने का उपाय बताया जब वह अर्चना से अकेले में मिल सकता था. वह एक बगीचे के बगल से गुजरती हुई सर्विस लेन थी. अंशुमन जब वहां पहुंचा तो चौंक गया! फूलों का रंग कुछ और चटख था, उनकी खुशबू आज ज्यादा मदिर थी और वह उनकी मुस्कराहट को साफ़ महसूस कर सकता था. जैसे सारे फूल एक सुर में कह रहे हों–ऑल द बेस्ट.

अर्चना जब सामने दिखाई पड़ी तो अंशुमन को वही महसूस हुआ जो मॉल में हुआ था. सेकंड के हजारवें हिस्से में उसका तापमान बढ़ गया और कम्पन होने लगा. कांपते हाथों से वह ख़त छूट गया और शरारती हवा ने उसे खुद ही अर्चना के पास पहुंचा दिया. अंशुमन के साथ आज सारी फिजा थी, क्योंकि उसे सच्चा प्यार था.

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अर्चना ने ख़त उठा लिया और अंशुमन की ओर बढाया. मुश्किल से अंशुमन ने उसे वापस लिया और अर्चना को खुद को क्रॉस करते देखा. लेकिन बात वही है, भावना जब हद से बढ़ जाती है तो साहस को जन्म देती है. अंशुमन ने कहा– ‘अर्चना, ये तुम्हारे लिए है’

शायद इससे ज्यादा भय और हया उसे कभी नहीं आई होगी. अर्चना ठिठक कर मुड़ गई और सारे फूल अपनी खूबसूरती की तुलना उसकी खूबसूरती से करने लगे.

‘मेरा नाम अंशुमन है. मैं प्रदीप भैया का छोटा भाई हूँ. ये तुम्हारे लिए लिखा है, इसे पढ़ लेना’

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इतना साहस! प्यार में साहस तो होता ही है, प्रमाणित हो रहा था. अर्चना ने ख़त ले लिया और पढ़ने लगी.

‘नहीं प्लीज. घर जाकर पढ़ लेना. और गुस्सा मत होना. मैं परेशान नहीं करूँगा’ इतना कहते हुए अंशुमन तेज़ क़दमों से चला गया. सच्चे प्यार को कोई इनकार नहीं कर सकता. अर्चना ने जब घर जाकर ख़त पढ़ा तो गुस्सा तो आया पर पता नहीं क्यों उसे कोई असुरक्षा नहीं हुई.

लेकिन परेशान न करने का मतलब ये तो नहीं की आँखों से ही ओझल हो जाओ. अर्चना हाँ बोले तो कैसे? माजिद के कहने पर अंशुमन जब फिर अर्चना के सामने आया तो अर्चना ने उसे ऐसे देखा जैसे पराया नहीं, कोई अपना हो. उसने इतना कहा–‘अंशुमन, मुझे तुम्हारे बारे में सब कुछ जानना है’ सारे फूल तालियाँ बजाने लगे. एक बड़े से सूरजमुखी ने तो शायरी भी कह डाली.

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ये थी इस भोले प्यार की शुरुआत. अंशुमन ने अपने बारे कुछ नहीं छुपाया. यह भी नहीं कि वह अमीर नहीं है, यह भी नहीं कि वह घरवालों की इच्छा टाल नहीं सकता और यह भी नहीं कि वह अर्चना के बिना रह नहीं सकता.

सारी सिगरेट ख़तम हो चुकी थी. अंशुमन भारी-भारी क़दमों से उठा. वाश बेसिन के पास जाकर उसने चेहरे पर पानी डाला. चेहरा उठाया तो सन्न रह गया. आइने में उसके स्थान पर अर्चना थी! चेहरा सफ़ेद पड़ गया था और आखें काली होकर अन्दर धंस गई थीं. डर के मारे वह चीख उठा…जब हॉल तक पहुंचा तो हर जगह अर्चना थी! आसुओं की गंगा फूट चुकी थी और रुदन इतना भयानक था की कलेजा फट जाए…

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चंद पलों में ही अंशुमन वाइन के कई पेग पी चुका था और गाड़ी स्टार्ट कर ली थी. एक हाथ से स्टीयरिंग संभाले और एक हाथ से वाइन पीते हुए उसकी गाड़ी अद्भुत गति से चल रही थी.

बड़ी हिम्मत और प्यार से उसने कहा था, ‘मैं तुमसे प्यार करता हूँ अर्चना’ अर्चना जवाब में मुस्कुराई तो अचानक ही परिदृश्य से सारे लोग, सारी वस्तुएं डिलीट हो गई. दृश्य कुछ ऐसा हो गया की संसार में सिर्फ अंशुमन और अर्चना हैं. उस दिन अंशुमन नाचते हुए घर पहुंचा था. आज उसे किसी की डांट खाने में भी मज़ा आ रहा था. उसने जब सर उठाकर ऊपर देखा तो भगवान हाथ फैलाये उसे आशीर्वाद दे रहे थे और बड़ी मनमोहक मुस्कान के साथ उसकी ओर देख रहे थे!

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अर्चना ने जब अपने जन्मदिन पर बुलाया तो गिफ्ट की समस्या आई. तब अंशुमन ने खुद बड़े भाई से पैसा माँगा. भाई साहब ने बिना कारण जाने बीस रुपये दिए और पुछा, ‘हो जायेगा?’ जवाब नहीं मिला तो हाँ समझ लिया. फिर माजिद ने भी खूब दिमाग लगाया कि क्या ख़रीदा जाये. लम्बी बहस भी चली. जब डिसाइड नहीं हो सका और समय हो गया तो अंशुमन चल पड़ा. उस दिन पहली बार अंशुमन ने अर्चना के घरवालों से अच्छी तरह बात की. सभी बहुत इम्प्रेस भी हुए. यह था पूर्णता की ओर उसका दूसरा कदम.

गाड़ी अजीब सी आवाज़ के साथ रुक गई. अंशुमन का चेहरा आंसुओं से पूरी तरह भीगा था. शर्ट भी नम हो चुकी थी. कदम ठीक से नहीं पड़ रहे थे. गेट खोलकर बाहर निकला और बोनट उठाया. समझ में क्या आना था? अगले पल फिर बोनट गिरा दिया और पुरी ताकत से गाड़ी को लात मारी. गाड़ी एक फीट पीछे खिसक गई. इस खेल में वह इतना ही साथ दे सकती थी.

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सहसा एक विचार आया. अंशुमन पैदल चलने लगा. फिर और तेज़ चलने लगा. और अब तो वह दौड़ने लगा था. बहुत तेज़ दौड़ने लगा था. अर्चना की साँसों ने जब यह दृश्य देखा तो उन्हें तरस आ गया…उन्होंने अपनी संख्या बढ़ाने का प्रयास शुरू कर दिया.

रोज़ मुलाकात होने लगी थी. अर्चना तो अभी तक अंशुमन की मासूमियत से प्रभावित होकर अपना दोस्त ही मानती थी पर धीरे-धीरे उसे भी एहसास होने लगा था कि दोनों एक-दुसरे के लिए ही बने हैं. वह अंशुमन को कभी अपने परिवार से या अपनी सहेलियों से मिलवाने में नहीं घबराई. अंशुमन मिलने में जरूर घबराया. अर्चना अंशुमन के घर भी आई. तब उसने सबका दिल जीत लिया था. वे तो उसके तहज़ीब और गुणों के मुरीद हो गए थे. ये सम्पूर्णता की ओर अंशुमन का अगला कदम था.

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एक पत्थर अँधेरे में पैर से टकराया और अंशुमन दूर तक घिसटता चला गया…यहाँ वेंटीलेटर पर अर्चना ने जोरदार हिचकी लेकर आँखें खोल दी. भगवान प्यार की परीक्षा ले रहे थे. पास खड़ी नर्स दौड़ कर डॉक्टर को बुला लाई. माजिद लगभग उड़ता हुआ नर्स के पास पहुंचा और पुछा, ‘क्या हुआ मैडम, वह ठीक तो है?’

‘अभी कुछ नहीं कह सकते. वी आर डूइंग अवर बेस्ट’ सुनकर माजिद वापस आ गया. अर्चना की माँ पिछले कई घंटों से रो रही थी और पिता शून्य में ताक रहे थे.

जब अंशुमन को देश के श्रेष्ठ कॉलेज में प्रवेश मिला और जाने का वक़्त आया तो अंशुमन रोया, अर्चना नहीं. वह उसकी सफलता की कामना करती थी और यह उसके लिए बड़ी ख़ुशी का समय था. स्टेशन पर अंशुमन ने सबकी नज़र बचाकर कहा था, ‘अर्चना, मुझे अब जीना है तो तुम्हारे साथ और मरना है तो तुम्हारे साथ.’अर्चना ने कस कर उसका हाथ पकड़ लिया. फिर बोली,‘सिर्फ जीना है, मरना नहीं. समझे?’

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नर्स बाहर आई. माजिद को थोड़ी दूर ले जाकर बोली,‘देखिये, हमने वेंटीलेटर हटा दिया है. ब्रीथिंग है, पर काफी वीक है. मे बी शी विल नॉट लास्ट फॉर मच टाइम. थोड़ी देर की मेहमान है. आप लोग चाहें तो उसे देख सकते हैं’ और अंशुमन की गति बढ़ गई. उसे आज ज़िन्दगी को पीछे छोड़ना था. अंशुमन की साँसें अर्चना के पास जाना चाहती थीं. इसलिए वो इतनी जोर से चल रही थीं कि अर्चना उन्हें महसूस कर सकती थी. उसकी उंगलियाँ हिल रही थीं और धुंधलाई आँखें अंशुमन का इंतज़ार कर रही थीं.

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जब अंशुमन एक साल बाद लौटा तो अर्चना से वहीं मिला. वह भावनाओं के उफान में उसे गले लगाना चाहता था, लेकिन दोनों एक-दुसरे को यूँ देखकर मुस्कुराये, कि आंसू निकल आये. सारे फूल भी अपने आंसू पोछने लगे. बड़े सूरजमुखी ने भी बगल वाले पीले गुलाब से रूमाल माँगा था. अंशुमन ने पुछा,‘कैसी हो अर्चना?’और अर्चना ने वह कह दिया जो हज़ार तीरों के घाव से भी ज्यादा कष्टदायक था. उसने कहा,‘मेरी शादी तय हो गई है अंशुमन. अब मैं तुम्हारी नहीं बन सकती.’सभी फूल चौंक गए. अंशुमन के शरीर में रक्त नहीं बचा. वह काठ हो गया! होश में आकर पुछा,‘क्यों किया ऐसा तुमने, क्यों मुझे मरने पर मजबूर कर रही हो?’

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‘जैसे तुम अपने घरवालों की इच्छा के खिलाफ नहीं जा सकते अंशुमन, वैसे ही मैं भी नहीं जा सकती. मुझे माफ़ कर दो. मैं तुम्हें प्यार करती हूँ और तुम्हारी तरक्की पर हमेशा खुश रहूंगी’ प्यार हुस्न पर मर मिटने का नाम नहीं है. ये तो दूसरे के सुख में सुखी होने का नाम है. अंशुमन का निर्मल दिल इतना परिपक्व नहीं था. अर्चना अपनी उम्र से कहीं ज्यादा समझदार थी. उसने अंशुमन से हमेशा प्रगति करने का वादा लिया. साथ ही यह भी कहा कि वह अपने पति को कभी धोखा नहीं देगी और उसके मान-सम्मान का ख्याल रखेगी.

ऐसी लड़की जिसकी ज़िन्दगी से दूर होगी वही दुखी होगा. अंशुमन कुछ ज्यादा हो गया. शराब और सिगरेट की आदत उसे यहीं से लगी जो उसे अन्दर से कमज़ोर बनाती गई. चेकअप करने के बाद जब डॉक्टर ने कहा था कि ये सब छोड़ दो वरना मर जाओगे, तो अंशुमन ने कहा था,‘मर तो पहले ही चुका हूँ डॉक्टर साहब, अब तो वादे की ज़िन्दगी जी रहा हूँ.’

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प्यार ने मौत का पीछा कर लिया था. अब वह उसे पीछे छोड़ने वाला था. अस्थमा से अक्सर खांसते रहने वाला अंशुमन पंद्रह किलोमीटर दौड़ चुका था. माजिद ने भी पिछले आधे घंटे में सैकड़ों बार घड़ी की ओर देखा था. उसने अर्चना के माता-पिता का हाथ पकड़ा और अन्दर ले गया जहाँ अर्चना अब तक मौत को मात दे रही थी. अर्चना की माँ के सारे आंसू निकल चुके थे, अब खून आंसुओं के रस्ते बह रहा था. उसके पिता भी जब फूट-फूट कर रोने लगे तो माजिद भी अपने आंसू रोक नहीं पाया और बाहर आ गया.

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एक गगनभेदी चीख थी! उसमे सच्चे प्यार की सदा भी थी और मौत को चुनौती भी थी. अंशुमन हॉस्पिटल पहुच चुका था. आते ही ‘अर्चना’ की पुकार सुनकर अर्चना ने आँखें खोल दी…भगवान ने उसे सहारा दिया और वह अपने आप उठकर बैठ गई. हाथ ऊपर उठ गए और आश्चर्यजनक रूप से पिछले दस दिनों में उसके मुंह से पहले बोल फूटे, ‘अंशुमन…’

ढेर सारी नर्स और डॉक्टर इकठ्ठा हो गए. उन्होंने अंशुमन के लिए तड़पती अर्चना को लिटा दिया और सांत्वना देने लगे.

बुरी तरह लड़खड़ाते हुए अंशुमन अन्दर दाखिल हुआ. माजिद ने दौड़ते हुए उसे पकड़ लिया.

‘ये क्या हो गया माजिद?’

‘अर्चना को बहुत ख़राब पति मिला था अंशुमन. उसने इसकी ज़िन्दगी नर्क बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. शादी के एक साल बाद ही तलाक दे दिया और न जाने कितने फ़ोन करने के बाद भी इसे मरता हुआ देखने के लिए नहीं आया.’

‘मैं हूँ न माजिद. वो मरेगी नहीं, मैं उसे बचा लूँगा.’

‘उसकी आखिरी ख्वाहिश तुमको देखने की है. तुमको देखकर शायद कुछ पल और जी जाये’

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माजिद उसे अर्चना के सामने लाया. अंशुमन का हुलिया उसकी जीत की कहानी कह रहा था. अर्चना के शरीर में हरकत हुई. माजिद उसके माँ-बाप को कुछ देर के लिए बाहर ले गया. अंशुमन अर्चना का हाथ पकड़कर बेड के पास ज़मीन पर बैठ गया. अब सब कुछ यकीन से परे था. अंशुमन के उफनते आँसुओं को अर्चना ने अपने हाथों से पोंछा. उसके चेहरे पर मुस्कराहट थी. बेशक ये वह फूल सा चेहरा नहीं था, बल्कि वैसा ही था जैसा अंशुमन ने आईने में देखा था. लेकिन प्यार था कि किसी शक्तिशाली ज्वालामुखी की तरह भावनाएं उगल रहा था.

‘अंशुमन, मैं जाने से पहले तुम्हारी कुछ चीज़ें लौटाना चाहती हूँ’

अंशुमन रो ही रहा था. अर्चना ने हाथ बढ़ाकर उसे कुछ दिया. ये वह बीस का नोट था जो गिफ्ट खरीद न पाने की वजह से अंशुमन ने उसे शर्माते हुए दिया था. अब वह अमूल्य था.

अंशुमन अर्चना को गले लगाकर रोने लगा. अर्चना प्यार से उसके सर पर हाथ फेरने लगी.

‘और भी कुछ सामान लौटाना है’

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अंशुमन ने सर उठाया. देखा तो अर्चना ने बगल में रखा एक कागज का पुर्जा उठाया. यह अंशुमन द्वारा अर्चना को दिया गया पहला प्रेम-पत्र था.

‘मैं इसे हजारों बार पढ़ चुकी हूँ. आज आखिरी वक़्त में तुम इसे पढ़कर सुना दो. फिर मैं चैन से मर सकूंगी’

अंशुमन ने ख़त हाथ में लिया. आंसू पोछे और पढ़ना शुरू किया.

‘अर्चना, पहली बार तुम्हारी बड़ी बहन की शादी में तुमको देखा था. तब ये पता नहीं था कि तुम क्यों हमेशा याद आती रहती हो. हक तो नहीं है पर मुझे तुम्हारी याद में रहना अच्छा लगता है. मुझे न नींद आती है और न तुम्हारी याद जाती है. मेरा मन किसी भी चीज़ में लगना बंद हो गया है. सच कहूं तो किसी से भी इतना प्यार नहीं रहा कि हर पल उसी के बारे में ख्याल आए. दूसरी बार देखने के बाद तो मेरा जीना ही मुश्किल हो गया है. पता नहीं इतनी हिम्मत कहाँ से आई है, पर मैं ये खुद को सुकून देने के लिए कर रहा हूँ.

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मैंने प्यार, मोहब्बत, इश्क, सबके बारे में सुना है पर ये वो नहीं है जो मैं या दूसरे सोचते हैं. क्या है ये तो मैं नहीं जानता पर हमेशा तुम्हें देखना और तुमसे बात करना चाहता हूँ. तुम्हें हमेशा सुरक्षित देखना चाहता हूँ. मुझे लगने लगा है की मेरी ज़िन्दगी अब तुम्हारे इर्द-गिर्द घूमेगी. तुम्हारे सिवा कुछ सोचना मुश्किल होगा.

मुझे तुमसे कोई जवाब या इज़हार नहीं चाहिए, बस तुम्हें हमेशा खुश देखना चाहता हूँ, हमेशा हँसता देखना चाहता हूँ’

ख़त पढ़ते-पढ़ते अंशुमन ने अर्चना की ओर देखा. उसकी आँखें खुली हुई थीं और चेहरे पर प्यार भरी मुस्कान थी. उसने आगे पढ़ना शुरू किया.

‘खुद को कहने से रोक नहीं सकता था इसलिए कह दिया. तुम नाराज़ मत होना और बिलकुल चिंता मत करना. मैं तुम्हारा रास्ता कभी नहीं रोकूंगा और कभी परेशान नहीं करूँगा– अंशुमन’

ख़त ख़त्म हो चुका था. अर्चना की आँखें अभी भी खुली थीं और चेहरे पर प्यार भरी मुस्कान थी.

सहसा अंशुमन को झटका सा लगा! जैसे धरती हिली हो. सेकंड के हजारवें हिस्से में उसका तापमान कई गुना बढ़ गया. यूं लगा जैसे अर्चना ने उसके चेहरे पर आँचल लहरा दिया हो.

आश्चर्यचकित अंशुमन ने अर्चना का हाथ पकड़ लिया. कोई हरकत नहीं हुई. पल भर में उसे सब समझ में आ गया. वह उसे गले लगाकर जोर-जोर से रोने लगा. अर्चना मर चुकी थी.
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