Top Letters
recent

'देवभाषा' के विद्वानों के नाम एक 'अज्ञानी' की चिट्ठी, संस्कृत भाषा की हत्या का जिम्मेदार कौन?

- डॉ. राकेश प्रकाश

मान्यवर विद्वानजनों को सादर चरणस्पर्श,
आप विद्वानों ने जब चाहा, जिसे चाहा, जिस हद तक चाहा, जिस मकसद के लिए चाहा इस्तेमाल किया और फिर उसे उसके हाल पर छोड़ दिया। दया का परित्याग तो आप जैसे विद्वानों की सबसे बड़ी निशानी है, तभी तो आप ज्ञानी हैं। पहले आपके पूर्वजों ने ज्ञान की दुनिया को एक ऐसी भाषा में समेट कर रख दिया, जिसके आस-पास तो क्या दूर-दूर तक हम जैसे अज्ञानियों के पूर्वजों को भटकने नहीं दिया जाता था। वेद, पुराण, उपनिषद, गीता, रामायण, महाभारत और न जाने कितने ग्रंथों की रचना आप ज्ञानियों के पूर्वजों ने संस्कृत भाषा में कर डाली। संस्कृत भाषा को पढ़ना या संस्कृत भाषा में ज्ञानार्जन करने का अधिकार सिर्फ खास वर्ग या जाति के लोगों तक सीमित कर दिया। महाशय, क्या मैं जान सकता हूं आपने या आपके पूर्वजों ने ऐसा क्यों किया? 

इसे भी पढ़ें...
संस्कृत कभी भी पूरे समाज या देश की भाषा नहीं रही, इसे जबरन थोपना गलत है

कई दिनों तक इस सवाल का उचित जवाब जानने की कोशिश की। इस सवाल के पीछे की सबसे बड़ी वजह है वो समाचार बुलेटिन, जिसे सुबह के वक्त पिछले कुछ महीनों से दूरदर्शन के चैनल डीडी न्यूज पर संस्कृत भाषा में 'वार्ता' के नाम से प्रसारित किया जा रहा है। साप्ताहिक कार्यक्रम वार्तावली भी प्रसारित की जाती है। अगर संस्कृत भाषा इतनी ही 'एक्सक्लूसिव' थी कि उस पर सिर्फ ज्ञानी और विद्वानों का ही हक था, तो फिर उसे आम लोगों के लिए सरकारी चैनल पर क्यों प्रसारित किया जा रहा है? इसके पीछे भी आप ज्ञानियों की कोई बड़ी साजिश तो नहीं है? 

इसे भी पढ़ें...
दै. हिंदुस्तान के एडीटर को खुला ख़त, कोई संपादक इतना निर्लज्ज कैसे हो सकता है?

देश में संस्कृत भाषा आज की तारीख में कितने राज्यों या जिलों में बोली जाती है, इस भाषा को बोलने वाले लोगों की कितनी संख्या है? कितने ऐसे लोग हैं, जो विद्वानों की भाषा संस्कृत को समझने की औकात रखते हैं? दिल्ली से प्रकाशित एक अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के आंकड़ों पर यकीन किया जाए तो हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा तादाद हिंदी बोलने वालों की है। दूसरे नंबर पर बांग्ला, तीसरे नंबर पर मराठी और चौथे नंबर तेलगु भाषा है। लेकिन संस्कृत भाषा को बोलने वालों की तादाद सिर्फ 24,821 है। यानि कि देश में संस्कृत महज 24,821 लोगों की ही मातृभाषा है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इससे कहीं ज्यादा बोडो, डोगरी, कोंकणी और मणिपुरी भाषा बोली जाती है। 

इसे भी पढ़ें...
संस्कृत के पैरोकार 'देशभक्तों' के घरों में झांककर देखिए, उनके बच्चे कहां पढ़ रहे हैं?

आखिर वो कौन सी वजह है, जिसने एक समय में भाषा की दुनिया में विशालकाय डायनासोर की तरह राज करने वाली और विद्वानों की भाषा कही जाने वाली संस्कृत को खुदकुशी करने पर मजबूर कर दिया? आखिर वो लोग कहां गए, जिन्हें संस्कृत भाषा पर बड़ा ही नाज था? यह सोचकर आप भी हैरान हो जाएंगे कि एक सौ पच्चीस करोड़ से भी अधिक की आबादी वाले हिंदुस्तान में संस्कृत भाषा बोलने वालों की संख्या पच्चीस हजार से भी कम है। क्या ऐसे में यह मान लिया जाए कि खुद तथाकथित विद्वानों की विद्वता ने इसकी निर्मम हत्या की साज़िश रच डाली ! नतीज़न संस्कृत भाषा आज मृत्यु-शैय्या पर इस उम्मीद में अपनी अंतिम सांसे गिन रही है कि देवलोक की भाषा कही जाने वाली संस्कृत को बचाने के लिए शायद कोई देवदूत रूपी मानव सामने आ जाए ! 

इसे भी पढ़ें...
अभिभावकों, शिक्षकों और छात्रों के नाम एक खुली चिट्ठी

पहले संस्कृत भाषा के ज्ञान की बदौलत ज्ञानीजन न सिर्फ सैकड़ों सालों तक दुनिया भर में ज्ञान की सत्ता के अधिष्ठाता बनकर घूमते रहे, बल्कि देवताओं की भाषा की धौंस दिखाकर आमलोगों से अपनी चरण वंदना भी करवाते रहे। वो भी एक जमाना था जब भाषा के नाम पर एक खास वर्ग न सिर्फ अपना विशेषाधिकार जताता था, बल्कि ज्ञान के लिए, अध्ययन-अध्यापन के लिए, ज्ञान की बजाए जाति को प्रमुखता दी जाती थी। अगर किसी ने बिना इन ज्ञानियों की मर्जी से ज्ञान की भाषा संस्कृत का ज्ञान प्राप्त करने की जुर्रत की, तो उसके कान में शीशा पिघलाकर डाल दिया जाता था। लेकिन वक्त के घूमते पहिए के आगे अब सभी तथाकथित ज्ञानी पुरुषों का अभिमान और घमंड चकनाचूर हो चुका है। मस्तक पर तिलक टीका और शरीर पर गेरुआ वस्त्र पहनने वाले को अब ज्ञानी नहीं, बल्कि कुछ और ही कहा समझा जाने लगा है। ऐसे कई सारे लोग तो आज जेल की सलाखों के पीछे हैं। 

इसे भी पढ़ें...
'फ्री सेक्स' की बात पर सार्वजनिक सम्भोग का ऑफर, धर्म-रक्षकों का ये कौन सा अवतार है?

दूरदर्शन पर जारी संस्कृत समाचार की बात करें तो यह एक खास वर्ग समुदाय को रोजगार देने की योजना से अधिक और कुछ भी नहीं है। जिस देश में कुल आबादी का आधा फीसदी हिस्सा भी संस्कृत पढ़ने या समझने की औकात नहीं रखता, वहां राष्ट्रीय स्तर संस्कृत भाषा में समाचार बुलेटिन प्रसारित करने का कोई औचित्य नज़र नहीं आता। हां, इससे इतना ज़रूर है कि कुछ खास लोगों को टीवी पर मनमाफ़िक तरीके से अपनी बात कहने का मौका ज़रूर मिल रहा है। 

जमाना डिजिटल हो चुका है, ऐसे में संस्कृत के पारंपरिक रूप को नई व्यवस्था में फिट कर पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकीन भी है। हमारी शिक्षा व्यवस्था से पढ़कर जो बच्चे निकल रहे हैं, उनमें ज्यादातर बच्चे ऐसे है, जिन्हें ढंग से हिंदी या अंग्रेजी भी नहीं आती है। ऐसे में संस्कृत को जानने या पढ़ने का सवाल ही नहीं पैदा होता है। लिहाजा आजकल के बच्चे संस्कृत का नाम सुनते ही नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। ऐसी स्थिति में बच्चों को संस्कृत पढ़ने के लिए कहना या उन पर थोपना किसी अपराध से कम नहीं है। हां, यह सही है कि सरकारी स्कूलों में संस्कृत और उर्दू के मास्टरजी होते हैं। लेकिन भविष्य में रोजगार को ध्यान में रखते हुए बच्चों की ज़िंदगी से खिलवाड़ आखिर कहां तक जायज है? 

इसे भी पढ़ें...
मोहन भागवत को खुला ख़त, RSS कभी देश की बुनियादी समस्याओं पर बात क्यों नहीं करता?

जिस दिन संस्कृत के ज्ञान को एक खास वर्ग समुदाय के दायरे में समेट दिया गया, उसी दिन विद्वानों और ज्ञानी पुरुषों ने इसकी जड़ में ऐसा मट्ठा डाल दिया था, जिसने आगे चलकर संस्कृत को जड़ से जहान तक मिटाने में अहम भूमिका निभाई। लेकिन विद्वानों को जब इसका अहसास हुआ कि उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकने वाली है, उन्होंने तुरंत राजनीतिक नेताओं को मोहरा बनाकर, गौरवशाली अतीत का हवाला देकर, ऐतिहासिक मूल्यों की दुहाई देकर और न जाने कौन-कौन से हथकंडे अपना कर संस्कृत विश्वविद्यालय से लेकर संस्थान तक और कॉलेज से लेकर विद्यालय तक देश भर के अलग हिस्सों में खुलवा दिए।

इसे भी पढ़ें...
साइंस के गुरूजी को ओपन लेटर, आप गलत थे, देश को यूनिवर्सिटी की नहीं गौशाला की जरूरत है

लाख कोशिशों के बाद भी एक जाति-विशेष की भाषा का जो हाल होना था वो हुआ। इस पर चीखना-चिल्लाना और रोना-पीटना कैसा? वेद-पुराण से लेकर तमाम ग्रंथों की भाषा संस्कृत आखिर क्यों विद्वानों की देखरेख में होने के बाद भी अपना वजूद नहीं बचा पायी? संस्कृत भाषा की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इसे कभी भी आम लोगों ने संवाद की भाषा के रूप में नहीं अपनाया। यहां तक कि तथाकथित विद्वानों ने भी संस्कृत भाषा की पीठ में छुरी घोपने का काम किया। मसलन जहां तक संभव हुआ एक खास जाति और वर्ग के लोगों ने अपनी तिजोरी भरने के लिए संस्कृत भाषा का इस्तेमाल किया। लेकिन जब संस्कृत भाषा के सामने अस्तित्व का संकट उभरकर सामने आया तो तथाकथित विद्वानों और ज्ञानी पुरुषों ने इससे अपना पल्ला झाड़ लिया। वह यह भी भूल गए कि संस्कृत के ज्ञान को मोहरा बनाकर इनकी कई पीढ़ियों ने न सिर्फ रोजी-रोटी कमाई, बल्कि समाज में इन्हें इज्जत भरी नज़रों से देखा जाता था। जब संस्कृत भाषा को अपनी रक्षा के लिए इन ज्ञानियों की ज़रूरत पड़ी तो यह अलग-अलग हालात का बहाना बनाकर किनारे हो लिए। यहां तक कि पूजापाठी ब्राह्मणों को भी आपस में संस्कृत भाषा की दुर्गति को लेकर बातचीत करते नहीं देखा गया है। 

इसे भी पढ़ें...
लिखना मुझे अच्छा लगता है क्योंकि लिखते हुए जीवन की तहें मेरे आगे खुलती हैं

संस्कृत के संस्थानों तक में बोलचाल की भाषा हिंदी, अंग्रेजी, तमिल, मलयालम कुछ भी हो सकती है, संस्कृत नहीं। भारतीय राजनीति में हाल के दिनों में गोत्र-जाति और जनेऊधारी जैसे मुद्दे उठाने के लिए ज्ञानियों के पास समय है। लेकिन संस्कृत भाषा पर मंडरा रहे अस्तित्व के संकट से कैसे निबटा जाए, इसे लेकर सभी विद्वानजन विवेक शून्य हो जाते हैं। संस्कृत भाषा का अतीत गौरवशाली रहा है, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन वर्तमान समय चुनौतपूर्ण और भविष्य अंधकारमय ज़रूर कहा जा सकता है। ये मैं नहीं कह रहा हूं, बल्कि मौजूदा हालात में ज्ञानीजनों की तमाम तथाकथित कोशिशों के बाद भी संस्कृत भाषा का हाल कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है।
My Letter

My Letter

Powered by Blogger.