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अमेरिका से एक बेटे की पिता को चिट्ठी, बच्चों को विदेश भेजने की ख्वाहिश रखने वाले मां-बाप जरूर पढ़ें

बेटा अमेरिका में जॉब करता है, उसके मां-बाप गांव में रहते हैं। बुजुर्ग हैं, बीमार हैं, लाचार हैं। बेटा कुछ सहायता करने की बजाय पिता जी को एक पत्र लिखता है। कृपया ध्यान से पढ़ें और विचार करें। अब यह फैसला हर मां-बाप को करना है कि अपना पेट काट काट कर, दुनिया की हर तकलीफ सह कर, अपना सब कुछ बेचकर, बच्चों के सुंदर भविष्य के सपने क्या इसी दिन के लिये देखते हैं? क्या वास्तव में हम कोई ग़लती कर रहे हैं?

- विनोद कुमार राय

पूज्य पिताजी,
आपके आशीर्वाद से आपकी भावनाओं इच्छाओं के अनुरूप मैं, अमेरिका में व्यस्त हूं। यहां पैसा, बंगला, साधन सब हैं, नहीं है तो केवल समय। मैं आपसे मिलना चाहता हूं, आपके पास बैठकर बातें करना चाहता हूं। आपके दुख दर्द को बांटना चाहता हूं, परन्तु क्षेत्र की दूरी, बच्चों के अध्ययन की मजबूरी, कार्यालय का काम करना जरूरी, क्या करूं? कैसे कहूं? चाह कर भी स्वर्ग जैसी जन्म भूमि और मां बाप के पास आ नहीं सकता।

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पिताजी, मेरे पास अनेक सन्देश आते हैं। माता-पिता सब कुछ बेचकर भी बच्चों को पढ़ाते हैं, और बच्चे सबको छोड़ परदेस चले जाते हैं, पुत्र, माता-पिता के किसी काम नहीं आते हैं। पर पिताजी, मैं कहां जानता था इंजीनियरिंग क्या होती है? मैं कहां जानता था कि पैसे की कीमत क्या होती है? मुझे कहां पता था कि अमेरिका कहां है? मेरा कॉलेज, पैसा और अमेरिका तो बस, आपकी गोद ही थी न? आपने ही मंदिर न भेजकर स्कूल भेजा, पाठशाला नहीं कोचिंग भेजा, आपने अपने मन में दबी इच्छाओं को पूरा करने इंजीनियरिंग/पैसा/पद की कीमत, गोद में बिठा बिठाकर सिखाई। मां ने भी दूध पिलाते हुये, मेरा राजा बेटा बड़ा आदमी बनेगा, गाड़ी बंगला होगा, हवा में उड़ेगा कहा था मेरी लौकिक उन्नति के लिए, घी के दीपक जलाये थे।

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मेरे पूज्य पिताजी, मैं बस आपसे इतना पूछना चाहता हूं कि, मैं आपकी सेवा नहीं कर पा रहा, मैं बीमारी में दवा देने नहीं आ पा रहा, मैं चाहकर भी पुत्र धर्म नहीं निभा पा रहा, मैं हजारों किलोमीटर दूर बंगले में और आप, गांव के उसी पुराने मकान में क्या इसका सारा दोष सिर्फ़ मेरा है?

आपका पुत्र
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