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अमित शाह को खुला ख़त, 'कश्मीर की कहानी दंगे की स्क्रिप्ट नहीं है, जो वोट के लिए दो मिनट में रच दी जाए'

जम्मू कश्मीर में राष्ट्रपति शासन बढ़ाने का प्रस्ताव रखते हुए संसद में अमित शाह ने कश्मीर समस्या के लिए देश के पहले पीएम जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया। अमित शाह ने कहा कि पटेल ने जूनागढ़ और हैदराबाद की समस्या का निबटारा किया और देश में सफल विलय कराया, लेकिन नेहरू ने कश्मीर की समस्या को बढ़ा दिया। गृहमंत्री के इस बयान के जवाब में शरदेन्दु कुमार वत्स ने अमित शाह के नाम खुला ख़त लिखा है।

-शरदेन्दु कुमार वत्स

आदरणीय अमित शाह जी,
अब आप देश के गृह मंत्री हैं भाजपा के अध्यक्ष नहीं। ऊंचाई पर होने का अपना अलग ही महत्व होता है, खासतौर पर युद्ध के समय। कश्मीर का स्ट्रेटजिक महत्व इसीलिए बढ़ जाता है कि वह ऊंचाई पर है, जहां से दक्षिण एशिया, पश्चिमी एशिया, पूर्वी एशिया पर नज़र रखी जा सकती है। कश्मीर के इस स्ट्रेटजिक महत्व को नेहरू जी से बेहतर कोई नहीं पहचानता था, शायद यही कारण था कि नेहरू जी किसी भी कीमत पर कश्मीर को भारत में विलय कराना चाहते थे, जबकि पश्चिमी शक्तियां अमेरिका और ब्रिटेन चाहते थे कि कश्मीर का विलय पाकिस्तान में हो जाये क्योंकि इन देशों को भी कश्मीर के स्ट्रेटजिक महत्व की जानकारी थी। उन्हें यह पता था कि पाकिस्तान को अपना पिछलग्गू बनाया जा सकता है, लेकिन भारत को नहीं, इसलिए इन शक्तियों ने पूरा जोर लगाया कि कश्मीर पाकिस्तान की तरफ चला जाये ताकि एशिया पर नजर रखी जा सके। 

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सरदार पटेल भी इस बात के लिए सहमत थे कि कश्मीर पाकिस्तान को दे दिया जाए और इसका खुलासा उनके स्वयं के लिखे पत्र में है, जिसको उनके निजी सचिव वी शंकर मेनन ने 'सरदार पटेल के चुने हुए पत्र-व्यवहार खण्ड-1' में संग्रहित किया है, इसके अतिरिक्त इस बात की पुष्टि लार्ड माउंटबेटन के प्रेस सलाहकार एलेन कैम्पबेल जानसन की लिखी किताब 'मिशन विद माउंटबेटन' से भी होती है।

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नेहरू जी के दबाव की वजह से सरदार पटेल ने कश्मीर के भारत में विलय के लिए प्रयास शुरू किया, एक तरफ़ नेहरू जी स्वयं वहां की जनता के सबसे बड़े नेता शेख अब्दुला से बात कर रहे थे, तो दूसरी तरफ राजा हरि सिंह से बात करने की जिम्मेदारी पटेल जी को दे रखी थी, यानी दोनों नेता मिल-जुलकर कश्मीर के भारत में विलय के लिए प्रयासरत थे, नेहरू जी को सफलता मिल चुकी थी, उन्होंने शेख अब्दुल्ला को राजी कर लिया था, लेकिन राजा हरि सिंह और शेख अब्दुल्ला के बीच कोई सहमति नहीं बन पा रही थी।


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इस संबंध में दो पत्र महत्वपूर्ण हैं, पहला-26 सितम्बर 1947 को नेहरू जी के प्रयास से शेख अब्दुल्ला ने जेल से हरी सिंह को लिखा कि 'हम अपने बीच की सारी सारी अदावतें खत्म करना चाहते हैं।' दूसरा पत्र नेहरू 27 सितम्बर 1947 को पटेल जी को लिखते हैं कि 'कश्मीर विलय में "समय" बहुत महत्वपूर्ण है और मुझे सूचना मिली है कि अक्टूबर में पाक कश्मीर पर हमला कर सकता है, इसलिए आप शीघ्र राजा को मनाएं ताकि शेख अब्दुल्ला और राजा में कोई समझौता हो जाये और भारतीय फौज की तैनाती कश्मीर में हो सके, यदि समय से समझौता नहीं हुआ तो शीत काल मे कश्मीर भारत से हवाई एवं स्थलीय मार्ग से कट जाएगा, ऐसी स्थिति में हमला होता है तो भारत कश्मीर को बचा नहीं पायेगा।'

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नेहरू जी की बात सच हुई जिस "समय" पर वह जोर देते थे उसमे पटेल जी विफल हुए और समझौता होने में लेट हो गया, उधर पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया। इस बात की पुष्टि करते हुए स्वयं पटेल जी 27 अक्टूबर 1947 को माउंटबेटन को लिखे पत्र में कहा था कि 'यदि हम 15 दिन पहले राजा हरि सिंह को मना लिए होते तो आज कश्मीर में भारत को युद्ध नहीं करना पड़ता, बल्कि यदि समय से भारतीय फौजें कश्मीर में तैनात कर दी गयी होतीं तो हमने पाकिस्तान के आक्रमण को विफल कर दिया होता।

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कुल मिलाकर कहने का मतलब यह है कि कश्मीर को लेकर दोनों नेताओं सरदार पटेल और नेहरू ने अपना पूरा योगदान दिया, नेहरू जी कश्मीर की भगौलिक स्ट्रेटजी को समझते हुए समय को काफी महत्व दे रहे थे लेकिन दुर्भाग्य से पटेल जी उस नियत समय में सफलता नहीं प्राप्त कर सके जिसका नतीजा था कि पाक कश्मीर के 1/3 हिस्से पे काबिज़ हो गया।

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बाकी सवाल उस संघी नर्सरी से है जो दिन रात नेहरू का कद छोटा करके सरदार पटेल का कद बड़ा करने के चक्कर में रहती है, लेकिन मेरे यह समझ मे नहीं आता कि नेहरू का कद छोटा करके पटेल का कद कैसे बड़ा किया जा सकता है? इन मानसिक बीमारों को यह समझना चाहिए कि जिस सरदार सरोवर के तट पर पटेल जी की सबसे ऊंची प्रतिमा खड़ी की गई है, उस सरदार सरोवर परियोजना की नींव ही नेहरू जी ने सरदार पटेल के सम्मान में उनके नाम पर रखी थी। इसलिए सोच-समझकर बोलिए क्योंकि कश्मीर की कहानी कोई दंगे की स्क्रिप्ट नहीं है, जो वोट लेने के लिए दो मिनट में रच दी जाए।
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