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आस्था के नाम पर दलालों की धोखाधड़ी और लंपटई झेलने वाले आस्तिकों के नाम खुला ख़त

- शुभम साहू अजीब

'काल्पनिक भगवान' को मानने वाले प्रिय आस्तिकों,
इसी महीने पारिवारिक सदस्यों की जिद पर उनके साथ शिर्डी और शनि शिंगणापुर गए थे, दोनो जगहों पर मेरा पूरा ध्यान 'गलत और सही' पर रहा, दोनों जगहों पर आपकी गाड़ी पहुंचते ही, कुछ दलाल आपकी गाड़ी के पास आते हैं और कहते हैं कि हम यहां की पंचायत के लोग हैं, हमारा काम दर्शन करने आए श्रद्धालुओं की मदद करना है, जो कि फ्री है।

पार्किंग मे गाड़ी खड़ी करवाकर वे आपको पार्किंग की 40 रुपये लेकर रसीद थमा देते हैं, जिस पर साफ लिखा होता है कि 'गाड़ी या गाड़ी में रखा सामान चोरी होने या गाड़ी मे टूटफूट होने पर' उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी। उसके बाद वे आपको गोल-गोल घुमाकर एक दुकान पर ले जाएंगे जहां पूजा का सामान मिलता है, तब करेंगे वो आपका मुंडन।

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सबसे पहले वो आप सबके जूते उतरवा लेंगे और जमा कर लेंगे वहीं, फिर कहेंगे कितनी पूजा थाली दूं? 3000 की थाली, 5000 की थाली? स्वाभाविक है आप ना नुकुर करेंगे, तब वे आप पर चढ़ बैठेंगे, झगड़ेंगे, ओछी भाषा का प्रयोग करेंगे और आपको टोपी पहनाकर ही दम लेंगे। आप मजबूर होकर टोपी पहनेंगे क्योंकि आप पार्किंग तक भूल चुके होंगे बहस और टेंशन में। 

अगर आप किसी तरह झगड़कर जीत गए तो आगे आपको जाना है मंदिर, फिर वहां पर (शिर्डी) में दर्शन के लिए पैसा चलता है, 500 रुपये दो, तो जल्दी दर्शन। अगर पैसे नहीं दिए तो फ्री के दर्शन पाने के लिए आपको नंगे पैर, कम से कम चार किलोमीटर पैदल चलाएंगे। जगह जगह यह लिखकर कि 'पैसे केवल दानपात्र मे डालें',  वो आपको दान की याद दिलाते रहेंगे। 

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करीब दो घंटों तक लाइन में लगाएंगे, आपका पूजा का सामान नारियल धूप वगैरह पहले ही ले लिए जाएंगे। फिर जैसे ही आप साईं के सामने खड़े होंगे, वहा बैठा पंडा आपसे फूल और चादर छीनकर वहीं डाल देगा और पीछे से कोई गार्ड का हाथ आपको खींचेगा और बाहर कर देगा। फिर बाहर आकर आपके घर का कोई सदस्य कहेगा, चलो प्रसादालय चलकर प्रसाद लेते हैं।

वहां से आप सारा सामान गाड़ी लेकर प्रसादालय जाएंगे, वहां अलग गुंडे टाइप दलाल होंगे। आगे फ्री पार्किंग लिखा है, लेकिन वहां आपकी गाड़ी नहीं जाने देंगे, फिर बहस, दादागीरी वगैरह। फिर आप प्रसाद लेना, हम तो लानत भेजकर लौट आए।

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अच्छी बात यह लगी कि द्वारकामाई (जहां साईं रहे) में उस समय का सामान रखा हुआ है,  जैसे बाबा की चिलम, बाबा उससे पहले मस्जिद में रहते थे वगैरह हिस्ट्री लिखी है। एक और बात, 'सबका मालिक एक' कहने वाले के पास जाने वाला, कोई बंदा मुझे मुस्लिम नहीं दिखा और वहां आपको साफ पता चलता है कि साईं मुसलमान ही थे।

जब हम शनि सिंगणापुर गए, वहां भी सेम टू सेम हुआ। वही टाइप के दल्ले वहां भी हैं। किसान के खून पसीने से पनपे अनाज का तेल शनिदेव (काला पत्थर) पर लगातार गिर रहा है और फिर सारा तेल नाली में। एक और बात, कौन मूर्ख कहता है कि शनि सिंगणापुर में चोरी नहीं होती, जबकि वहां के किसी घर में दरवाजा नहीं है? 

पता नहीं आस्तिक यह सब क्यों झेलते हैं, जो भगवान अपने पास चल रहे ये सब गलत काम और गुंडों पर नियंत्रण नहीं कर सकता, वो आस्तिकों का क्या भला और बुरा करेगा?

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