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पीएम मोदी के नाम एक 'देशभक्त' की चिट्ठी, गरिमा और लिहाज का दामन तो मत छोड़िए

- आर. देवेंद्र शांडिल्य

प्रधानमंत्री जी, आप बहुत खुशनसीब हैं. खुशनसीब यूं कि आप बहुत तेज़ दिमाग़ के हैं और राजनीति में फिलहाल आपके दुश्मन की शिनाख्त जिस व्य‌क्ति के रूप में की गई उसे कम दिमाग, ठस दिमाग और लो आईक्यू लेवल वाले आदमी के तौर पर स्टेबलिश कर ‌दिया गया। अनिच्छुक तो वो था ही, है ही.

प्रधानमंत्री जी आप खुशनसीब हैं कि आप बोलते बहुत अच्छा हैं. अच्छा इसलिए कि सामने नेता प्रतिपक्ष के पद पर जो आदमी है वह दो लाइन बिना गलती किए नहीं बोल सकता। उसे हिंदी के शब्दों, उनका अर्थ, मुहावरे, व्यंग्य, व्यंग्य बोलने का अंदाज कुछ नहीं पता। उसका ड्रेसिंग सेंस ऐसा है कि लगता है कि वो किसी स्कूल का पीटी टीचर है या किसी थिएटर का पार्ट टाइम कॉमेडियन। मुझे नहीं पता कि उस व्यक्ति के अंदर ऐसी क्या योग्यता है कि आज वह इस पद पर है। 

प्रधानमंत्री जी आप इस‌लिए भी खुशनसीब हैं कि विपक्ष की बेचों पर वो लोग बैठे हैं जो राजनीति में या तो नए हैं या फिर वह उस स्तर के नेता नहीं है जो स्टेचर आपका है। आप ये बात जानते हैं कि जितनी फ्री बैटिंग आप लोकसभा में कर लेते हैं राज्यसभा में ऐसा नहीं हो पाता। वजह सामने की उन बेंचों पर बैठे लोग ही हैं।

प्रधानमंत्री जी आप भाग्यशाली हैं कि आपकी किसी भी आड़ी, तिरछी, सही गलत बात पर आपके पीछे मेज थपथपाने वाले 300 सांसद हैं। 'जो रबड़ी खाये पहलवान' जैसी बात पर भी हंसकर आपका साथ देते हैं। उसमें कुछ यूनियन मिनिस्टर्स भी हैं। आप किसी का भी मजाक उड़ाने में कितनी भी नीचे चले जाओ, मेजों की ये थपथपाहटें आपके संग ही रहती हैं। आप किसी को मन्दबुद्धि कहते हुए ट्यूब लाइट कह देते हैं और सत्ता पक्ष में ठहाकों का दौरा पड़ जाता है। आप यकीनन खुशनसीब हैं, वो इसलिए कि ऐसे शब्दों का समर्थन संसद में नहीं होता रहा है। वो कार्रवाई से बाहर हो जाते रहे हैं।

प्रधानमंत्री जी आप मेहनती भी बहुत हैं। ये 300 सीटें यूं ही नहीं आईं हैं। आपने मेहनत की है, हर तरह से मेहनत की है। पर मेहनत आपके पहले वाले प्रधानमंत्रियों ने भी की थी। बूथ कैप्चरिंग करके यहां कोई नहीं बैठा था। किसी को कम सीटें मिली थीं किसी को ज्यादा पर थे सभी प्रधानमंत्री।

पर आपके साथ जो अलग है, वह दिखता है। ये दिखना आपको किसी और कतार में खड़ा करता है। जहां प्रधानमंत्री के रूप में आप अकेले हैं। हर व्यक्ति मजाक करता है। हर व्यक्ति हंसता है। बस उसके मजाक और हंसने के तरीके और वजहें अलग-अलग होती हैं। उसका बौद्धिक स्तर मजाक के स्तर से कई बार रिफ्लेक्ट होता है। हाउसफुल सीरिज की फिल्मों में जो लोग हंसते हैं, पाया ये जाता है उन्हें जाने भी दो यारों या ब्लैकमेल या कालाकांडी जैसी फिल्‍में नहीं अच्छी लगती। वह उसमें उब जाते हैं। 

संसद में एक-दूसरे पर कटाक्ष हमेशा किए गए हैं। चिकोटी हमेशा काटी गई है। कानपुर विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी में बैठकर मैंने मधु लिमये, पीलू मोदी, पंडित नेहरु, चन्द्रशेखर, अटल बिहारी बाजपेयी, राम मनोहर लोहिया की लोकसभा स्‍पीच पढ़ी हैं। उन स्पीच में विरोधियों पर फूल नहीं बरसाए जाते थे। व्यंग्य से चूका नहीं जाता था। पर प्रधानमंत्री जी, गरिमा और लिहाज का दामन कभी नहीं छोड़ा जाता था। इसके पहले ना वहां कभी ट्यूबलाइट हुआ और ना ही ताड़का। 

बहुत पीछे मत जाइए। 2004 से लेकर 2014 तक जब देश में मनमोहन सिंह की सो कॉल्ड कमजोर सरकार थी। उस समय की ही स्‍पीच उठाकर देख लीजिए। उस प्राइम मिनिस्टर जिसे आप ने बाथरूम में नहाते देखा था कि कोई भी ऐसी बात जो निम्न दर्जे की हो और आपको याद हो? इस संसद में बैसाखियों पर खड़े मनमोहन, अटल, नरसिम्हा, वीपी सिंह की भी सरकारें थीं और 400 से अधिक सांसद जीतकर आए राजीव गांधी की सरकार भी। एक स्पीच ऐसी नहीं रही जहां अपने विरोधी पर इतने ओछे तरीके से संसद में हमला किया गया हो। 

नरसिम्हा और मनमोहन को छोड़ दें तो बाकी लोग रैलियों के अच्छे वक्ता भी रहे। पर उन्होंने इस फर्क को समझा कि रैली क्या होती है और संसद क्या? दोनों के फर्क और दोनों के स्तर से वो वाकिफ थे। प्रधानमंत्री जी आपने उस फर्क को मिटा दिया। सरकार आएंगी, जाएंगी। लेकिन आप प्रधानमंत्री के पद जिस तरफ लेकर जा रहे हैं ये किसी के ‌लिए अच्छा नहीं है। व्यक्ति की ताकत और औकात भी बढ़ती है जब उसका दुश्मन भी उसके मियार का हो। 

आपका
एक देशभक्त
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