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बंद हो चुके टेलीग्राम के नाम ख़त, अलविदा खलनायक ! उम्मीद है, फिर कभी नहीं मिलेंगे

-धर्मेन्द्र मोहन पंत

टेलीग्राम! तुझे तो जाना ही था। खलनायक कभी जिंदा नहीं रहता। एक दिन उसे जाना होता है। अब डर भी नहीं लगता है तुझसे लेकिन जब गांव में था तो दहशत पैदा करता था तू। पूरे गांव वालों में। टेलीग्राम (तार) आया है तो जरूर कुछ अनहोनी होगी। तू क्या जाने कि वह फुसफुसाहट अंदर तक कितना कंपा जाती थी। तू पहुंचता बाद में था लेकिन तेरा डर लोगों को पहले से थर्रा देता था। आखिर तेरी अच्छी छवि बनती भी तो कैसे। मैंने तो यही देखा कि जब भी तू आया किसी घर को रुला गया। गांव को शोक में डुबाता था तू।

अरे कभी तूने उस चिट्ठी या मनीआर्डर से कुछ सीख लिया होता, जिसके बारे में सुनते ही चेहरा खिल उठता था। तूने अगर गांव की दादियों, ताइयों, चाचियों, भाभियों की चिट्ठी आने पर चेहरे की चमक देखी होती तो तू भी उससे ईर्ष्या करने लग जाता। तुझे जब-तब चिट्ठी का साथ मिला जरूर, लेकिन तूने उससे कुछ नहीं सीखा। तुझे तो हमेशा दूसरों को पीड़ा देने में मजा आता था। अरे आखिर तू ये क्यों भूल जाता था कि वह डाकिया भी तुझसे नफरत करता था, जिसके झोले में तू कुछ समय गुजारता था। डाकिया भी तुझे किसी दूसरे के घर में देकर गंतव्य तक पहुंचाने का आग्रह करके चला जाता था।

तू कभी हमारे गांव, मेरे पहाड़ के गांवों को नहीं समझ पाया था। तू ईर्ष्या करता था उनसे, इसलिए मैंने तुझे कभी अच्छी खबर लाते हुए नहीं देखा था। अरे कभी तो तूने ये समझा होता कि हमारे कितने भाई देश की रक्षा के लिए सीमाओं पर तैनात हैं। वहां से तो उनकी कुशलता की खबर लाता तो कितना अच्छा होता। नहीं, तूने ऐसा सीखा ही नहीं था। अरे कभी तो तुझे एहसास हुआ होता कि हमारी अर्थव्यवस्था मनीआर्डर पर आधारित है। गांव छोड़ना हमारी मजबूरी थी। देहरादून से लेकर दिल्ली और मुंबई की सड़कों पर खाक छानते हुए पेट भरने के लिये बने थे हम। यहां कौन था हमारा। मां ने परायों को सौंप दिया था अपना बेटा। मां ने देश को समर्पित कर दिया था अपना बेटा। भेज दिया था उसे पाकिस्तान से लेकर चीन की सीमाओं पर। और हां, अब जबकि तू जा रहा है तो तुझे एक सचाई बता दूं। वह मां कभी तेरा नाम नहीं लेना चाहती थी।

मेरी मां को भी एक टेलीग्राम मिला था। उसके बाद क्या हुआ था यह सुनकर तेरी भी रूह कांप जाएगी। आखिरी दम तक तड़पाता रहा था मां को वह छोटा सा संदेश। पिताजी पढे़ लिखे थे, फौज में रहे थे और तमाम चीजों के अच्छे जानकार थे। पूरा गांव अपनी समस्याओं के समाधान के लिए उनके पास आता था, लेकिन उस दिन वह भी तेरा मजमून नहीं समझ पाए थे। 

तुझे तो जाना ही था। अब तेरी किसी को जरूरत नहीं रही। लेकिन उम्मीद है कि तू इस सीख के साथ गया होगा कि जो दूसरों को दुख देता है उसका अंत बुरा होता है। तू खुद को ही देख ले। आज तुझे पूछने वाला कोई नहीं है। कोई नहीं है तेरा हमदर्द। कोई नहीं है तेरा अपना। जवानी में तूने जो गुल खिलाए उनकी सजा भुगत रहा है तू। उम्मीद है कि दुनिया तुझसे सबक लेगी। तू भले ही मेरे लिए खलनायक रहा, लेकिन मैं तेरी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करूंगा। ओम शांति ओम।

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