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रूठी हुई प्रेमिका को आखिरी खत, नहीं पता तुम क्यों खफा हो, पर इस बार तुम्हें मनाने नहीं आऊंगा


- दिलीप तिवारी

प्रिये,
मैं जब, हमारे मन मिलन के मंदिर में आया तो तुम्हें ना पाकर मेरी आँखें उदासी के समुन्दर में डूब गईं....ना जाने क्यों, हमेशा से, मेरे मन में एक अनजानी आशंका अपना डेरा जमाये रहती थी कि एक दिन तुम मुझे यूँ मंझधार में छोड़ कर चली जाओगी...शायद मेरे अनजाने भय ने, अपना चमत्कार दिखाया और वैसा ही हो गया जिसका डर मुझे हमेशा से सालता था कि एक दिन तुम मुझे बिना बताये, मेरी नजरों से अचानक ओझल हो जाओगी. 

मैंने कितने सपने संजोये थे कि तुम्हारे साथ स्विट्ज़रलैंड की वादियों में तो कभी विएना की झील में नौका विहार करूँगा ...तो कभी हम दोनों, दुनिया की नजरों और गमो से दूर, रिओ के किसी अनजाने समुद्री बीच पे इक दूसरे के साथ अठखेलियाँ करंगे. 

हाय री किस्मत सब उम्मीदों और कल्पनाओ के सपने...समुद्र के किनारे बने घरौंदों की तरह तहस-नहस होकर बिखर गए...यूँ तो मेरे सपनों के घरौंदों से तुम्हे पहले भी अच्छी खासी अदावत रहती थी...जो तुम उन्हें जाने अनजाने अपने जिद और अटल इरादों की तेज लहरों से समय-समय पर तोड़ती रहती... और मैं फिर भी दीवानगी के आलम में डूबा उन्हें हर बार पहले से ज्यादा मजबूत और बड़ा बनाता रहता. पर शायद, इस बार...अब मुझमें इतनी हिम्मत, ताकत और सब्र नहीं बचा कि किनारे की रेत को मुट्ठी में जकड़ कर...फिर से इक्ट्ठा करके ...फिर से सपनों के नए घरौंदे को बना सकूं. 

मैं अपने टूटे दिल को किसी तरह संभाल कर और मजबूत कर यह ख़त लिखने का दुस्साहस कर रहा हूँ...अगर मेरे ख़त से तुम्हें किसी तरह की ठेस या पीड़ा पहुंचे तो मुझे एक पागल, आवारा और दीवाना समझ कर माफ़ कर देना. मुझे नहीं मालूम, मेरे इस ख़त का क्या हश्र होगा...इस पर तुम्हारी नजर-ए-इनायत होगी या तुम इसे बेरुखी से यूँही किसी कोने में डाल दोगी या इसे बिना पढ़े ही किसी कचरे के डब्बे में फेंक दोगी या फिर अपने गुस्से में इसके टुकड़े-टुकड़े कर हवा में उड़ा दोगी या फिर अपनी सहेलियों में इसे एक मजाक का विषय बना कर चटकारे ले लेकर पढ़ोगी. 

खैर, तुम जो भी फैसला लोगी अच्छा ही होगा...क्योंकि मेरी ख़ुशी तो सिर्फ तुम्हारी ख़ुशी में ही है...अगर तुम इसे पढ़ने की इनायत बख्शो तो शायद मुझे कुछ समझ पाओ...यूँ तो पहले भी तुम मुझसे अक्सर, किसी ना किसी बात पे खफा होकर, मुझे अकेला छोड़ जाती थी... मैं हर बार तुम्हारे सामने झुकते हुए तुम्हें मना लाता और तुम भी थोड़ी नजाकत और नखरों के बाद मान जाती...हम फिर से अपनी अपनी रूहानी दुनिया में खो जाते...यह जानते हुए भी कि मेरी और तुम्हारी दुनिया इस धरती के दो ध्रुवों की दूरी पे है. 

पर इस बार मैं तुम्हें मनाने नहीं आऊंगा...मेरा यह ख़त मेरी तरफ से मेरा आखरी प्रयास है, अपने प्रेम की बुझती लौ को थोड़ी देर तक जलाते रखने का, हर बार की तरह इस बार भी मैं तुम्हारा मिलन मंदिर में इंतजार करता रहा, करता रहा, सोचा तुम अब आओगी, तब आओगी...पर तुम नहीं आई ...मुझे नहीं पता इस बार तुम मुझसे क्यों और कैसे रुष्ट हो गई? 

मैं रात भर करवट बदल बदल कर सोचता ..शायद आज की रात तुम आओ और तुम्हारे इंतजार में आधी आधी नींद में जागकर तारे देखता...शायद उसे मेरा भेजा हुआ सन्देश, चाँद से मिल जाए...पर तुम्हें ना आना था ना तुम आई...अब मैंने भी अपने दिल को समझा लिया कि शायद मेरी किस्मत में किसी का प्यार ही नहीं...फिर तुमसे ही क्यों उम्मीद रखूं? लगता है इस जन्म में शायद इंतजार ही मेरी साधना है, शायद मुझे इस साधना में अभी और कष्ट झेलने और देखने बाकी हैं!

मेरे मन में तुम्हारे प्रति कोई वैमनस्य, क्रोध या अफ़सोस नहीं है...मैं धन्य हूँ कि मुझे जीवन भर ना सही, पर कुछ वक़्त के लिए ही सही तुम्हारा साथ तो मिला...मुझे नहीं पता कि मेरी पूजा में कहां कमी रह गई थी या तुम्हें प्रेम की देवी बनाने की मेरी चेष्टा बचकानी थी? फिर भी मैं तुम्हारा उम्र भर के लिए शुक्रगुजार हूँ कि तुमने मुझे कुछ दिनों के लिए ही सही, वह असीम ख़ुशी, उत्तेजना, हौसला और मनोबल दिया...जो मैं जिन्दगी की लड़ाई में लड़-लड़ कर थक कर, कहीं खो चुका था. 

तुम जब तक मुझे नहीं मिली थी, मेरी जिन्दगी एक वीरान रेगिस्तान की तरह थी...तुम्हारे आने के बाद इसमें हुई उम्मीदों की बारिश की बौछारों ने इसे हरा भरा बनाया...जहां कल तक सन्नाटे का आलम था, तुमसे मिलने के बाद वहां उत्तेजना और उम्मीदों का नखलिस्तान गुलजार होने लगा, जहां उमंगो की नदी सूख कर अपना दम तोड़ चुकी थी...वहां उल्लास का सागर हिलोरें लेने लगा था...तुम्हारे पल-पल के साथ की ख़ुशी में, मेरा आँगन इतना रोशन हो गया था कि लगता ही नहीं था जैसे यहां कभी निराशाओं और बदहाली का कोई रेगिस्तान भी था. 

अब तुम चली गई हो...मुझे नहीं पता कि चीज़ें फिर से शायद वैसी हो जाएं, पर मैं कोशिश करूँगा कि इस बार, इस सदमे से उबर जाऊं...तुम्हारे इस तरह से जाने के लिए मैं तुम्हें कसूरवार नहीं ठहराऊंगा? अब नाव का इस्तेमाल सिर्फ नदी पार करने के लिए होता है, उसे अपने साथ घर थोड़ी ही लाया जाता है. यह और बात है कि मुझसे किसी को अपने फायदे का तो किसी को वक़्त का, तो किसी को अपने मोक्ष का लक्ष्य ढूंढना था. 

शायद हमारा मिलना ही इन जालिम नक्षत्रों के अनुकूल ना था...वरना हम दो विपरीत ध्रुवों में रहने वाले...तुम अपने परलोक को सुधारने में व्यस्त और मैं इस लोक को भोगने वाला कैसे और क्यों मिले यह भी एक राज रह गया, तुम आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक और सूक्षमता को खोजती रही और मैं अपनी स्थूलता में उलझा उसमें तुम्हें ढूंढता रहा...ढूंढ हम दोनों ही रहे थे...मैं तुम्हें और तुम किसी और को. 

मुझे यह तो नहीं पता कि तुम किस लोक से आई और किस लोक में जाना चाहती थी...पर मेरा लोक परलोक तो सिर्फ तुम्हारे इर्द-गिर्द ही था...तुम्हें तन और मन से पाना ही मेरे लिए सूक्ष्म और स्थूल दोनों था...तुम जीवन में आत्मज्ञान और खुद को समझने में लगी रही और मैं तुम्हें, मेरी मंजिल तुम थी और तुम्हारी मंजिल कुछ और...! 

शायद तुम्हारे मन में सूक्ष्मता इतनी समा गई कि तुम्हें मेरे स्थूल शरीर की भावनायें और जरूरत, गैरजरूरी और बचकानी लगती होंगी...तुम्हें मेरी मोहब्बत पे हंसी आती होगी और शायद तुम्हें मेरी इबादत एक मक्कारी और फ़रेब लगती होगी? हम दोनों भी कितने अजीब और अलग थे...तुम मुझे संत बनाना चाहती थी और मैं इंसान बनने की असफल कोशिश कर रहा था...तुम अपने संकल्प से कष्ट, आभाव और दुःख को अपने जीवन की चुनौती समझ कर हंसी हंसी झेलती रही...वहीं मैं जीवन में नयी-नयी उमंगों को खोजता कि अगर जीवन में सुख, भोग और विलासिता नहीं तो फिर जीवन का अर्थ ही क्या है...न तुम गलत थी न मैं? 

अब मैंने भी ठान लिया है कि अब जब तुम नहीं हो...मैं भी तुम्हारी याद में, रातों को करवट बदल-बदल कर नहीं जागूँगा...अपने ऊपर किसी गम के बादल को मंडराने नहीं दूंगा...मुझे मरने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है...क्योंकि इस बार मुझे विश्वास है...मैं गलत नहीं हूँ...इस बार मेरे दिल पे कोई बोझ नहीं कि मैंने तुम्हे अनजाने में कोई कष्ट या किसी तरह का दुःख पहुँचाया...यह तुम्हारा फैसला है...इसलिए उसका सम्मान करते हुए मैं अपनी बाकी बची जिन्दगी, नहीं जी पाऊंगा. 

भविष्य में अगर तुम्हारा मन बदल जाए और तुम मेरे पास वापस आना चाहो, तुम्हें हमारे मन-मंदिर का पता मालूम ही है...पुरानी मोहब्बत की खातिर, मैं कुछ दिन सुबह को तुम्हारी राह देखूंगा...अगर तुमने, मुझसे कभी प्रेम किया होगा तो तुम अवश्य आओगी...वरना मैं इसे, अपने एक असफल प्रेम की अधूरी दास्तान समझ कर अपने दिल के किसी कोने में हमेशा-हमेशा के लिए दफ़न कर दूंगा. 

मेरा हाथ तुम्हारे हाथ को थामने के लिए हमेशा तत्पर रहेगा...अगर जीवन में कभी अँधेरा इतना बढ़ जाए कि तुम्हें अपने साए से भी डर लगने लगे...तुम अपने को अकेला और कमजोर समझने लगो...कोई तुम्हारा साथ दे या ना दे, पर मेरा हाथ तुम्हारा इंतजार करता मिलेगा...भले ही वह जीवन का कोई सा भी पड़ाव हो...आशा है तुम अपने जीवन में खुश..सुखी, खुश-खुश रहोगी.

तुम्हारा आवारा...पागल...दीवाना ...
तुम्हारा........... दिलीप

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