Top Letters
recent

सबके सामने इतना बड़ा अपमान ! उस दिन से पिताजी हमारी नज़रों से गिर गए



- चारू 

मैं अपने पिता से बहुत प्यार करती थी...उन्होंने हमें ईमानदार रहना सिखाया था, अंधविश्वास से दूर रहना सिखाया था, अपनी नज़र से, तर्क वितर्क और विवेक द्वारा वस्तुओं को देखना और समझना सिखाया था। उनकी उँगली पकड़ कर चलते हुए हमने सूरज चाँद और इस विस्तृत संसार को जाना था। ईश्वर के अस्तित्व पर लगते प्रश्न चिह्न को उनकी बातों में महसूस किया था। वे मेरे आदर्श थे....यहां तक कि मैं अपना जीवन साथी पिताजी के जैसा ही चाहती थी।

पर एक दिन...मुझे सतना स्टेशन पर ज़ोर से एक चाटा पड़ा... कारण यह था कि  दूर की रिश्तेदारी का एक लड़का और मेरी सहेली हमारे परिवार के साथ मैहर देवी के दर्शन को जा रहे थे। हम तीनों हमजोली थे और रास्ते भर बतियाते रहे। पिताजी को मेरा किसी लड़के से हँस हँस के बात करना नागवार गुज़रा...सबके सामने इतना बड़ा अपमान!!! उस दिन से पिताजी हमारी नज़रों से गिर गए थे...मुझे उस चाटे की भी याद आई वो तब पड़ा था  जब मैंने एक दलित के प्लेट से गुझिया उठाकर खा ली थी। 

मेरे मोहल्ले की एक लड़की ने जब प्रेम विवाह कर लिया तो..17 साल की उम्र में आनन फानन में मेरी शादी मुझसे 10 साल बड़े, कानपुर यूनिवर्सिटी से थर्ड डिवीजन  ग्रेजुएट से तय कर दी...मैं फर्स्ट डिवीजन की स्टूडेंट रही थी...इलाहबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में 75% पाकर बीए कर रही थी। उस दिन के बाद से 'माता पिता का स्थान स्वर्ग से ऊँचा होता है' जैसी उक्ति से मुझे वितृष्णा हो गयी।

वे बेहद निरीह लगे थे जब वो मां से कह रहे थे "बेटी को मत बताना कि लड़का नशा करता है।" फिर मेरी नज़र में मेरे पिता का वह स्थान कभी न रहा। शादी हुई, और उसके बाद तो ज़िन्दगी कई तूफानों से गुजरी। मेरी ज़िंदगी का निष्कर्ष तो यह रहा है, जो भी फैसले हमने बिना किसी दबाव के मुक्त मन से लिए वो सब बेहद खूबसूरत फैसले रहे। रेडियो से जुड़ी तो पता चला मुझे 'बोलना' भी आता है। थियेटर से जुड़ी तो खुद की अभिनय क्षमता से रूबरु हुई। संगठन के जरिए महिलाओं के लिए काम किया..तो लगा ज़िन्दगी चल पड़ी है। नौकरी मिली...अब मेरी दोनों बेटियों को उनकी मर्जी का आकाश दे सकती हूं।

पिताजी से मिलने जाती रहती हूँ... कुछ दिन पहले ही वो पाठक जी की लड़की द्वारा कायस्थ जीवन साथी चुनने के कारण बेहद क्षुब्ध थे। उनसे बात करने की कोशिश की इस विषय मे, पर वो आज भी नहीं बदले। वो उन मेरे विचारों से बेहद नफरत करते हैं जिन्हें बचपन मे उन्होंने ही गीतों और कविताओं के माध्यम से सिखाया था। 

"थके श्रम जीवों के पसीने भरे सीने लग जीने को 
सफल करने के लिए सोते चलो" (प्रसाद)
'वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे" (मैथली शरण गुप्त)

मैंने वही सीखा जो उन्होंने सिखाया था...मेरी नज़र मेरे विवेक के लिए जो कुछ सही था, किया। फिर भी ....मैं उनकी कुल कलंकिनी बेटी हूँ...जिसपर वो बेहद शर्मिंदा हैं.. आज भी... मेरे शहर के प्रगतिशील मित्र  भी मुझे समझाते रहे थे, "तुम्हारी वजह से तुम्हारे कितने शर्मिंदा होते होंगे, सोचो क्या हाल होता होगा उनका जिसकी बेटी पति का घर छोड़कर आ गई है।"

मुझे महसूस हुआ था कि यह पितृसत्तात्मक संस्कार ही है  जिसके कारण लोगों की सहानुभूति  माता पिता के प्रति ही पहले होती है। माता पिता का प्रेम अधिक पावित्र और सच्चा होता है मुझे इस बात पर विश्वास नहीं है।पर प्रेम पर यकीन है। प्रेम कर पाना आसान नहीं है। यही कामना है कि मैं अपनी दोनों बेटियों को सच में प्रेम कर सकूं।
Myletter

Myletter

Powered by Blogger.