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आखिरी प्रेम पत्र : धन्यवाद मुझे उस समय छोड़ने के लिए जब मुझे तुम्हारी जरूरत थी


- गीतांजलि शर्मा

प्रिय दीपक,
तुम गये तो थे लौटने के वादे के साथ, और तुम लौटे भी, पर अब तुम मेरे नही रहे. मैंने भी तुम्हारा हर पल इंतजार किया, हर आहट पर नजर गडाये रखी, पर तुम परिदृश्य से उसी तरह लापता रहे जैसे तुम कोई काल्पनिक चरित्र थे, और तुम्हारा होना सिर्फ मेरा भ्रम था, कि तुम कहीं थे ही नही. मात्र मेरे आभास थे, नकली थे. जो मेरे मन ने मेरे दिल और दिमाग पर थोपे थे.
आज बहुत बेचैन थी मैं, और शायद 2-3 महीने बाद फिर से इतनी बेचैन थी. हाँ! यही बेचैनी तो तब भी थी जब तुम लौटे थे, मुझे छोडकर जाने के 15 दिन बाद ही, मैं बेचैन थी, पता किया तो पता लगा था कि तुम आकर लौटे हो अभी. फिर तब भी यही आभास था जब अब से दो महीने पहले तुम आकर बिना कोई खबर दिए लौट गये थे. आज भी बेचैन थी तुम्हे याद करके, ना जाने क्यों भीतर की बेचैनी आज तुम्हारे बारे में जानने को मजबूर कर रही थी. मैंने पता किया तो तुम आये हुए हो, दो दिन हुए. तुम दो दिन से आये हुए हो और मुझे पता भी नही? ना जाने क्यों दुःख नही हुआ, फिर भी उत्सुकता वश तुमसे मिलने चली आई. जैसी की अपेक्षा थी, तुम अपनी तरफ से ही मेरे से सभी रिश्ते समाप्त कर चुके थे. ना जाने क्यों, इस बात को जानकर भी मुझे दर्द नही हुआ. शायद इससे बड़ी चोट तो तुम मुझे पहले ही दे चुके, अब छोटे जख्मो से दर्द नही होता.
लेकिन ऐसा भी क्या, कि तुम ही शुरू करो और तुम ही खत्म? आखिर प्यार तो हम दोनों ने किया था ना? सारे हक तुम्हारे ही तो नही सिर्फ. कुछ हक तो मेरा भी है. जितने दिन हम साथ थे, तो उस समीपता का सुख दोनों ने उठाया तो मेरे जैसे कुछ दर्द तो तुम्हे भी होना चाहिए. जब प्यार का इज़हार दोनों ने किया था तो सम्बन्ध समाप्ति की घोषणा भी दोनों ओर से होनी चाहिए. एकतरफा फैसला लेने का अधिकार तुम्हे नही है.
तुम आये और चले गये मेरे जीवन से, बिना कुछ कहे, पर ये अधिकार दिया किसने? जब आये थे तो कहते थे कि तुम्हे मुझसे प्यार है और मैं कहती थी की मेरे से सहानुभूति है तुम्हे, दया है मेरे लिए, तो तुमने कहा था की नही, सहानुभूति और दया अक्षम के लिए होती है, तुम तो सक्षम हो. तुमसे प्यार है. और मैं उसी को सच मान बैठी थी. पर मैं सही ही थी, सहानुभति समाप्त हुई तो मैं गले की फ़ांस जैसी लगी. जिसे तुम ने चुपचाप निकाल फैका, पर मैंने कहा था ना, की मेरी आदत नही किसी भी बात को यूँ ही जाने देना! तो तुम्हे कैसे जाने देती? आखिर मेरी जिंदगी की जरूरत बन गये थे कभी! अभी तो बहुत कुछ कहना है, कुछ बातो के लिए धन्यवाद कहना है, कुछ उलाहने देने हैं और श्राप, हाँ श्राप भी! सो कहूँगी.
तो सुनो, धन्यवाद उस सबकुछ के लिए, जो तुमने मेरे लिए किया. धन्यवाद हर बात के लिए. मुझे चैन देने के लिए, मुझे एक अलग अहसास दिलाने के लिए, धन्यवाद मेरी जिंदगी बन जाने के लिए. धन्यवाद खुशियाँ देने के लिए. और भी है सुनो, धन्यवाद बेचैन करने के लिए. धन्यवाद मुझे छोड़ जाने के लिए, वो भी तब जब मुझे तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत थी.धन्यवाद मुझे अवसाद देने के लिए, वो अवसाद देने के लिए जिसमे मैंने अपने जीवन के कीमती महीने बिता दिए. धन्यवाद मुझे वो सबक देने के लिए जो मैं तुम्हारे से मिले बिना सीख ही नही सकती थी. धन्यवाद मुझे उस समय छोड़ने के लिए जब मुझे तुम्हारी जरूरत थी. धन्यवाद वादे करके न निभाने के लिए. धन्यवाद तुम्हारे हरेक झूठ के लिए. जब जब मैंने तुम्हे ढूंडा और तुम नही मिले, उन सभी लम्हों के लिए धन्यवाद. धन्यवाद दिल से सोचने वाले को प्रैक्टिकल बना देने के लिए. बेवफाई के धन्यवाद. हर पल के लिए, हर लम्हे के लिए, जिनमे मैं चूर चूर हुई, उन सभी लम्हों के लिए धन्यवाद. धन्यवाद उन आंसुओ के लिए, जो कीमती तो बहुत थे पर तुम्हारे बिना रुकते ही नही थे.
खुद को खो बैठी थी मैं, बड़ी मुश्किल से लौटी हूँ, क्योकि पहले तो मुझे प्रेमी की नही दोस्त की जरूरत थी, लेकिन तुम्हारे प्रयासों से प्रेम का मीठा मीठा अहसास मुझे हुआ था. और जब मैंने तुमसे कहा था की हाँ मैं भी तुमसे प्यार करती हूँ तो वो १००% सच था. लेकिन तुम तो दिल्लगी कर रहे थे. तुम्हे प्यार नही था कभी भी, शायद मुझसे बात करना अच्छा लगता था तुम्हे, या कुछ समय आकर्षण भी हुआ हो, या शायद मेरे हालात के लिए दया ही उमड़ आई हो. ना जाने क्या था, पर मुझे तो परिशुद्ध प्रेम ही था. खोना ही था. प्यार में विछोह जब समाज के डर से या मजबूरी से हो तो इतना अकेलापन महसूस नही होता लेकिन जब प्रेमी की बेवफाई से हो तो वो दर्द असहनीय होता है. हाँ! खो बैठी थी मैं खुद को. पर मरने की नही सोच पाती थी. शायद क्षीण सी आशा थी की आओगे जरुर. आये भी. कई बार आये. पर मेरे लिए नही. और मैं ओर मजबूत होती गयी. क्या हुआ जो पहले से चूर एक प्रतिमा को तुमने भी ठोकर लगा दी. प्रतिमा सिख गयी जीना टूट कर!
जो हुआ उसे भूलना तो नामुमकिन है, पर आज दर्द नही है! बिल्कुल भी नही! क्यों नही है मैं नही जानती. मैं कल भी दिल से तुम्हारी थी, आज भी हूँ. पर शायद तुमको भी मेरा होना चाहिए, ये खयाल मन से निकल गया, मैं अधूरेपन में पूर्णता को पा गयी? ये जान गयी. समझ गयी की प्रेम तभी पूरा हो जाता है जब वो आपके दिल में जगह बना ले, उसको पाना ना पाना उतना भी जरूरी नही.
पता है दीपक, ऐसा क्यों हुआ? तुम दीपक थे और मैं बाती. बाती जलती है तो नाम दीपक का होता है रौशनी करने के लिए. पर जलती तो सिर्फ बाती है. दीपक तो हर रोज़ बाती बदलता है. बाती अपना अस्तित्व मिटा उसे रोशन करती है और दीपक वैसा ही रहता है, अविचलित, अमिट. किन्तु दीपक कितना भी अमिट हो जलती हुयी बाती उसके ह्रदय पर ऐसी कलुषता का धब्बा छोडती है की दीपक सप्रयास भी नही मिटा पाता जलने के निशान को. तुम भी पल पल जलते मेरे अस्तित्व के निशान को अपने दिल से मिटा न सकोगे, श्राप ही समझना इसे.
पर फिर भी परमात्मा से प्रार्थना करूंगी की मेरे प्रति किया गया व्यवहार कभी तुम्हे सताने तुम्हारे सपनों में न आये, तुम्हे कभी अपराधबोध न हो. और जो तुमने मेरे साथ किया वो कभी तुम्हारे साथ न हो.

अंतिम प्रणाम और उन आंसुओ की अंतिम बूंदों के समर्पण के साथ, जो आज इस अंतिम पाती को लिखते हुए बहती गयीं. (अंतिम प्रेम पत्र है, इसे पढकर मेरे से बचे खुचे सम्पर्क के साधनों को भी मिटा देना.)
दिल से आज भी तुम्हारी
बाती
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