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प्यारे दोस्त को चिट्ठी, तुम्हारी ज़िंदगी एक दिलचस्प धोखे को जी रही है, देख रहा हूं अंदर का आर्टिस्ट कैसे मरता है!



- आशुतोष तिवारी

प्यारे दोस्त, 
न जाने मैं तुम्हें यह ख़त क्यों लिख रहा हूँ,  जबकि मेरे पास तुम्हें यह बता सकने की असीम सुविधा है। शायद यह मेरे भीतर का एक ऐसा ग़ैर पेशेवर  उन्माद है जिस पर मेरा भी नियंत्रण नही है। शायद यह एक बुलावा है, तुम्हारे भीतर की उस चेतना के लिए, जो अवचेतन में सो रही है। तुम्हारी समूची प्रतिभा, जो अभी तलछट पर है, यह ख़त उसके सतह पर आ सकने का इंतज़ार है। शब्दों की अपनी गुंजाइश है लेकिन मेरी कोशिश है कि इनके ज़रिए ही मैं तुम्हारी ठहरी हुई, लूप में फँस चुकी रचनात्मक अवचेतना को आवाज़ दूँ ताकि हम उस कला को घटते हुए देख सकें जो तुम्हारे भीतर ‘जीवन को प्लान’ करने के ख़ूबसूरत खोल  में फँसी हुई है।

क्या तुम ख़ुद को जानते हो। एक ऐसा शख्स जिसके अध्ययन की जड़े बरगद के तनों की तरह फैली हुई है। जिसके अनुभव के इलाक़े में न सिर्फ़ ‘क्लासिज्म’ है बल्कि उसके आगे की चीज़ ‘रोमांटिसिज्म’ भी है।पत्रकारिता के सबसे ज़हीन कालेज की प्रवेश परीक्षा में तुम शीर्ष पर थे।भारत के सबसे विराट फ़िल्म संस्थान ने  तुम्हारी क़द्र की है। तुम्हारी आँखो में प्रेम की स्थिरता है, रिश्तों का स्नेह है - वह सब कुछ है जो एक दिलदार और छू लेने वाले शख़्सियत का मटेरियल हो सकता है। एक पैकेजदार नौकरी है और जीवन जीने की एक प्लानिंग भी। सही से देखूँ तो तुम्हारे जीवन के हर क्षेत्र में एक कमाल का संतुलन है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का बेहतरीन संतुलन की तरफ़ अग्रसर तुम्हारा जीवन - क्या यह तुम्हें ख़ुशी देता है। और यही मेरी सबसे बड़ी चिंता है। 


तुम्हारी ज़िंदगी एक दिलचस्प धोखे को जी रही है। किताबों के अथाह इनपुट के बाद सृजन का आउटपुट क्यों नही है? ऐसा नही है कि तुम लिखते नही। मैंने तुम्हें पैसों के लिए लिखते हुए देखा है। मैं अगर यह समझता कि तुम सिर्फ़ पाठक हो, सर्जक नही हो, मैं तुम्हें यह ख़त कभी नही लिखता। दरअसल यह मैंने  इसीलिए लिखा है क्योंकि मैं तुम्हारे अंदर के उस आर्टिस्ट से परिचित  हूँ जो तुम्हारी ‘अवचेतना’ में बैठा हुआ है। तुमने उसको बाहर लाने के दरवाज़े बंद कर दिए हैं। इसलिए तुम कई दफ़ा यह सोचते हो कि इतना पढ़ने के बाद भी कलात्मक आउटपुट गिना चुना क्यों  है? कुछ विशाल धैर्य से बैठ कर कलात्मक क्यों नही लिखा जाता? क्यों ऐसा होता है कि सिर्फ़ टिप्पणियाँ लिख कर उठ जाते हो -  फ़िल्म हो या किताब। सिर्फ़ समय एक समस्या नही है, बल्कि यह एक ऐसी अजीब त्रासदी है, जिसे हम सब भागते हैं। 

यह त्रासदी है - संतुलन। तुम्हारे जीवन में ‘संतुलन का यह ख़ूबसूरत आयोजन’ ही वह बंद दरवाज़ा है जिसके भीतर अवचेतन में बैठा आर्टिस्ट बुज़ुर्ग हो रहा है। तुम सोचते हुए, सब संतुलित होने के बाद यह दरवाज़ा खोल दोगे पर कई दफ़ा यह सम्भव होते नही देखा गया है। फ़्रायड के एनालिसिस में कला को ले कर जो सबसे ख़ास बात यह है, वह है अवचेतन के इसी कलाकार की। तुम्हारी चेतना में सिर्फ़ वह कार्यव्यापार है जिसमें एक संतुलित ख़ूबसूरत जीवन का इरादा है। फ़्रायड कहता है जब तक तुम अवचेतन के आर्टिस्ट को चेतना के साक्षात संसार  से अवगत नही कराओगे वह कभी आकार ही नही लेगा।


संतुलन इसका दुश्मन है। तुम्हारे अवचेतन में किडनैप आर्टिस्ट के आँसू रिस रिस कर तुम्हारे चेतन हिस्से पर आते है और इसीलिए तुम कभी कभी बहुत ख़ूबसूरत टिप्पणियाँ लिख देते हो। यह कई लोगों के साथ होता है  फ़ेसबुक पर अधिकतर ख़ूबसूरत टिप्पणियाँ करने वाले लोग बहुत बेहतर कला दुनिया को दे सकते थे लेकिन उन्होंने इसी संतुलन के धोखे में अंदर का कालजयी आर्टिस्ट तबाह कर दिया और मीडियाकर बन कर रह गए। मैं खुल कर तुमसे कहना चाहता हूँ, यदि तुमने जल्द ही संतुलन के खोल से निकल कर, जीवन के इस विराट संग्राम की वेदनामय -मदहोश अनुभूतियों का स्वाद नही लिया, यह संतुलन तुम्हें मीडियकर बनाएगा। तुम प्रसिद्ध तो होगे पर अपने भीतर के कालजयी कलाकार को दफ़न कर दोगे।

यह सब यूँ ही नही है। उदाहरण भी हैं । सर्जन प्रक्रिया के रहस्यों के बारे में पश्चिम में बहुत कुछ खुल कर लिखा गया है। पता चला है कि पूर्व चेतन, अवचेतना और चेतन के परस्पर द्वन्द पर ही कामायनी ने प्रसाद को लिखा है। रचनाकार के जीवन के अपने तनाव, जो उसके भीतर के अनायास, अनप्लांड और बेढ़ब असंतुलन से जन्मे होते हैं, वह ही अवचेतन में बैठे आर्टिस्ट का दरवाज़ा खोलते है। 

अज्ञेय की इंसेस्ट वेदना ने ही उन्हें दृष्टि दी है। निराला आधी रात में उठ कर किसी पीड़ा पर हँसने लगते थे, फिर लिखने बैठ जाते हैं। हिंदी में असंगत नाटकों का सबसे ज़हीन लेखक भुवनेश्वर तो पूरी तरह विक्षिप्त हो गया था। प्रेमचंद्र एक अध्याय लिखने के बाद घंटो टहलते थे। सुकरात को लगता था कि उसके साथ कोई पिशाच चल रहा है। पास्कल सोचता था कि उसके पैरों के नीचे खाई खुदी है। 

कॉलरिज अफ़ीम के नशे में जीवन बर्बाद करके बायोग्राफ़िया लिटेरिया दे गया। कलाकारों के ऐसे बहुत से किस्से हैं। बस यह बताने का इरादा ये है कि तुम इस असंतुलन को देखो। किसी भी बड़े आर्टिस्ट का जीवन बहुत प्लांड, संतुलित नही था। आज तुम जिनका जीवन बहुत संतुलित देखते हो, आर्टिस्ट कहते हो, वह चेतन भगत है। तुम्हारे भीतर की प्रतिभा कहीं ज़्यादा विराट है जो संतुलन का बलिदान माँगती है। रिस्क माँगती है। कड़े फ़ैसले माँगती है। पेशेवर बंधन से मुक्ति माँगती है। लौट आओ दोस्त! दुनिया तुम्हारी अनुपम कला का इंतज़ार कर रही है।


एक ख़ास बात बताऊँ। तुम स्वयं देखना। जब तुम बौद्धिक लिखते हो अच्छा लिखते हो पर जब कला पर लिखते हो, अपने मन का क्यों नही लिख पाते? तुम चाहते बहुत हो कि फ़िल्म, कविता, कहानी या कोई ऐसा कलात्मक काम सम्भव हो, जो क्लासिक हो, पर असल में,  जीवन में कुछ और हो रहा है। क्यों? दरअसल कला और बौद्धिक लेखन में उन्माद का एक अंतर है। कालजयी कला भोगे गए जीवन के उन्माद से जन्म लेती है। 

कई दफ़ा देखा गया है कि जब तक कलाकार विक्षिप्त रहा, वह वास्तविक कलाकार रहा, जब कुंठाए ख़त्म हो गई, जीवन शांत हो गया, आदमी आलोचक हो गया। सेनेक, सिसरो, प्लूटार्क, पास्कल इसके गवाह हैं कि कितने ही आर्टिस्ट बाद में राजनीति और इतिहास के अध्येता हो गए, कलाकार नही रहे। आशु का यह ख़त तुम्हारी अवचेतना में बैठे आर्टिस्ट की पुकार है। सुन लो दोस्त।

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