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भाजपा समर्थकों को खुला खत, नफरत, भय, प्रोपेगंडा और झूठ की उम्र समाज मे बहुत ज्यादा नही होती



- मनीष सिंह

प्रिय भाई भाजपाई, 
तुम्हे देखा है बरसो से। गली मोहल्ले से लेकर टीवी तक संघर्ष करते हुए, बेरोजगारी, महंगाई, अकर्मण्यता, अहंकारी सरकार के खिलाफ तुम्हारे उद्घोष सुने। तुम्हारी सरकारें गिरती, लाठी डंडे पड़ते। तुम थोड़ा जीतते , ज्यादा हारते, मगर तुम्हारा गजब जीवट कभी कमजोर न पड़ा।

तुमने लड़ाई लड़ी, सड़कों पर, सोशल मीडिया, विज्ञप्तियों में, जमीन पर गांव गांव में। हमे बताया कि देश का प्रबंधन, विकास और गरिमा बेहतर कैसे होगी।फिर, उत्साहहीन, बेमजा और अपना बेहतर समय पार कर चुकी सरकार के ख़िलाफ़ हमने आपको विश्वास दिया। 30 साल में पहली बार, पूर्ण बहुमत.. । शुभ आशीर्वाद कि जाओ, जो सोचते हो, कहते हो.. करके दिखाओ। तुम्हारा वक्त आ गया.. 

.. और चला भी गया। छह साल बाद, तुम में अधिकतर अपनी उस छवि की दुर्बल छाया रह गए। तो कुछ रावण भी हो गए। दुर्बल छाया, प्रेतछाया या फिर हो रावण... हमे इनसे डर लगता है। जुगुप्सा होती है। तुम्हारा वो झंडा लहराना छाती पर तीर सा लगता है, तुम्हारे साधारण कथन अप्रतिम क्रोध पैदा करता है। तुम्हारा आकर खड़ा हो जाना ही नफरत जगाता हैं। क्या समझते हो तुम, कि देश तुमसे क्यो बदल गया ?? 
इसलिए भाई, कि तुम बदल गए। सारा वक्त तुमने चेहरा नही, आईने के धूल को पोंछने में गंवाया। तुम, तुम्हारे साथी, सारी सेना .. झूठ और कुंठा और अहंकार के विशालकाय झुंड में बदल गए। ये झुंड, और इसके साथ तुम, देश की जीवनी पर घुटना रखे, अट्टहास कर रहे हो। वी कांट ब्रीद.. सांस नही आ रही भाई । अरे, हम तुम्हारे अपने ही देशवासी है, क्या तुम भूल गए?? 

तुम भूल गए वो वादे.. समृद्धि, नॉकरियाँ, सबका साथ?? और कहां भटक गए तुम..? मुसलमान, पाकिस्तान, गाय, नेहरू..?? पहले झूठे आंकड़े दिए, झूठ पकड़ आया तो वह भी देने बन्द कर दिए। अब सारा वक्त कांग्रेस की नाकामियां गिनाते गुजरता है। खुद को केवल उतना ही खराब बताते, जो कांग्रेस 52,62, 72 या 2012 में थी। ये बताता है कि नेता और सरकार अपनी नैतिक ताकत खो चुकी है। 

नफरत, भय, प्रोपगंडा, झूठ की उम्र एक खुले समाज मे ज्यादा नही होती। सत्तर साला अहमक पागल की उम्र भी बेहद ज्यादा नही होगी। पार्टी तो अजर अमर है। तुम सरकार नही भाई, दल और देश के सिपाही हो। नेता हो, ताकतवर हो। एक तुम ही हो जो पार्टी की साफ नजर आ रही डेस्टिनी को बदल सकता है। उठ सकता है, गांव में, मंडल में, जिले पर, राज्य में.. दिल्ली में बैठे किसी वरिष्ठ और समझदार को मजबूती दे सकता है। चार साल है, पर्याप्त है धारा बदलने को। 

अगर नही तो ये जान लो कि सारी काठ की हंडियां चढ़ चुकी। अब देशव्यापी दंगे ही बचते है। जब आदेश मिलेगा, तो तुम भले नही, तलवार लेकर निकलने वाला कोई तुम्हारा ही युवा समर्थक होगा। वही जो अभी कॉपी पेस्ट कर रहा है, फारवर्ड कर रहा है। गालियां दे रहा है। जिसने असल मे तुम्हे रिप्लेस कर दिया है। इन्हें तुम न रोक पाए थे, न रोक सकोगे। न चाहकर भी भी साथ देना होगा, चुप रहना होगा। खून के छींटे तुम्हारे दामन पर उड़ेंगे। पीढियां थूकेंगी। 

कौन थे, क्या हो गए, औऱ क्या होगे अभी ?? हमे मालूम है, तुम कसमसा रहे हो। भीतर की मानवता आगे धकेलती है, अनुशासन की घुट्टी पीछे। मगर इस वक्त तुम बेहद अहम हो भाई। दुस्साशन नही, युयुत्सु बनो। इस देश को बचाओ, दल को बचाओ। देश की स्मृति छोटी है। जो हुआ, माफ कर देगा। वरना वह दूसरी ओर माफी देने को तैयार हो चुका है। चुन लो अपना भविष्य..

तुम्हारा अपना
एक्स वोटर

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