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दुनिया का सबसे चर्चित लव लेटर, न जाने तुम्हारे लफ्जों ने इतनी कंजूसी क्यों कर ली है?

इमरोज और अमृता प्रीतम ने जो खत एक-दूसरे को लिखे, वो साहित्य ही नहीं हर प्यार करने वाले के लिए भी धरोहर की तरह हैं। पढ़िए अमृता और इमरोज के ख़त। 

अमृता का ख़त

‘राही,

तुम मुझे संध्या के समय क्यों मिले? जिंदगी का सफर खतम होने वाला है। तुम्हें अगर मिलना था, तो जिंदगी की दोपहर को मिलते, उस दोपहर का सेंक तो देख लेते।’ काठमांडू में किसी ने यह कविता हिंदी में पढ़ी थी। कई बार कई लोगों की पीड़ा एक-जैसी होती है। मेरी जिंदगी के खतम होते इस सफर में अब मुझे सिर्फ तुम्हारे खतों का इंतजार है। मेरा यह इंतजार तुम्हारे इस बंबई शहर की जालिम दीवारों से टकराकर हमेशा जख्मी होता रहा है। पहले भी चौदह बरस, राम बनवास जितने, इसी तरह बीत गए। बाकी रहते बरस भी लगता है, अपनी पंक्ति में जा मिलेंगे। आज तक तुम्हारा एक ही खत आया है। शायद तुम्हें काठमांडू का पता भूल गया है। रोज वहां मैं तुम्हारे एक लफ्ज का इंतजार करती रही। वहां मेरे लिए लोगों के पास बहुत शब्द थे, दिल को छू लेने वाले, पर उन्होंने इंतजार की चिंगारी को और सुलगा दिया और जला दिया। मुझसे उसका सेंक सहा न गया। तीन दिन के बाद मुझे बुखार हो गया।

कल वापस आई, रास्ते में हवाई जहाज बदलकर। सीधे सफर की सीट नहीं मिली थी। रात को सवा नौ बजे पहुंची। इंतजार कह रहा था कि पहुंचने पर मेरे लिए कोई संदेशा तो जरूर होगा। न जाने तुम्हारे लफ्जों ने इतनी कंजूसी क्यों कर ली है? आज की डाक भी आ चुकी है। सवाल का जवाब बनने वाले, मुझे इस चुप का मायने तो समझा जाना।

तुम्हारी सदा से 

आशी

01-02-1960

इमरोज का ख़त

तुम्हारे इंतजार में शाम होने लगी है।

तुम्हारा खत नहीं आया, खैर तो है?

ओ, मेरी आशा के रंगों की रखवाली, देखना इन रंगों पर कोई परछांवा न पड़े और न कोई सेंक ही पहुंचे।

इन रंगों को ढूंढ़ते-ढूंढ़ते मैं देखो, सब कुछ गवां चुका हूं और अब ये रंग मेरे हो चुके हैं।

इस किस्मत की खुशी में मुझे कुछ खोने का गम नहीं-

मेरी रहमत,

मेरा इंतजार रखो।

सारा हाल, घड़ी-घड़ी का पल-पल का, मेरे रंगों की खबर देती रहा करो।

इन्हीं सब रंगों का 

जीती

26-04-1960  

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