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महात्मा गांधी की किताब 'मेरे सत्य के साथ प्रयोग' की ही ताक़त थी कि मैं उस नफ़रत से निकल आया

- शुभम तिवारी

लगभग 2012 की बात है  और उन दिनों मैंने 'मेरे सत्य के साथ प्रयोग' पढ़ी थी। उस समय संघ के लोगों से मिलना जुलना था ही। आसपास बस बीजेपी वाले ही घर से लेकर सब बीजेपी के ही सपोर्टर। संघ के लिए एक सॉफ्ट कॉर्नर था ही क्योंकि विवेकानंद से लेकर भगत सिंह की बात वहीं की जाती थी। 

स्कूलों में तो भगत सिंह के बारे में कुछ बताया ही कहाँ जाता है । तो आसान माध्यम वही होता था जानने का ( भले ही ग़लत जानकारी) । लेकिन मैं शाखा में कभी नहीं गया क्योंकि मुझे वहां खिलाए जाने खेल नहीं पसन्द थे। मुझे पतंगबाज़ी, शतरंज, क्रिकेट और काफ़ी दिन स्नूकर बहुत पसंद रहा। लेकिन मैं कभी- कभी किसी न किसी कार्यक्रम में चला जाता था। 

फिर एक बार मैं गया हिन्दू युवा वाहिनी के कार्यक्रम में और 2013 रहा होगा। क्योंकि भाई हम बीजेपी के समर्थक। मोदी वोदी तब भी कुछ न थे तब हमाए लिए बीजेपी मतलब ब्राह्मण। आरक्षण पसंद नहीं था। अखिलेश यादव ही सिर्फ़ थोड़े- थोड़े पसन्द थे उस समय। 

फिर हुआ यूं कि चले गए 30 जनवरी के दिन जब उस कार्यक्रम में गए जिसमें हिंदु धर्म पर बात होनी थी। तो शुरुआत में एक वक्ता ने आते ही ये बोला कि 30 जनवरी को आने वाले दिनों में हम एक पर्व के रूप में मनाएंगे। बस इतना सुनना था कि किसी ने मेरे गोली मार दी हो। और उस आदमी की वो हंसी मुझे इतनी घिनौनी लग रही थी। कि मैं बस किसी तरह अपने आपको वहां रोके रहा। बाक़ी उसके बाद क्या बातें हुई वो सब इन 7 सालों में हो ही रहा हैं । लेकिन उसकी वो बात ऐसी लगी कि उसके बाद मेरा दिमाग़ बस सुन रहा था और मैं अंदर - अंदर गुस्से से भरा था कि कहा जा रहा था कि गांधी हिन्दू नहीं था। मुस्लिम था।  बाक़ी क्या-क्या कहा था वो सब छोड़ ही दीजिए। मुस्लिमों को लेकर क्या कहा गया ख़ैर उसको छोड़ ही देते हैं। 

उसी दिन मेरे दिमाग़ में ये बैठ गया था कि ये अलग ही तरह की नफ़रत है। लेकिन मैं कुछ न कहकर मौन रहा लेकिन  लगातार कई दिनों तक मुझे ये बात खटकती रही कि गाँधी को जो मैंने पढ़ा है वो तो इतना साफ़ आदमी, धार्मिक आदमी ख़ुद अपनी सारी ज़िन्दगी बयां कर दी है। सारा सच लिख दिया उस इंसान को कोई ऐसा कैसे बोल सकता है। 

फिर धीरे- धीरे गाँधी से ज़्यादा इन लोगों के इतिहास, भूगोल को पढ़ना शुरू करा जो गाँधी की हत्या को जश्न के रूप में मानने वाले हैं भविष्य के भारत में। और आज वो जश्न मना रहे हैं जो उस दिन मैंने वहां सुना था वही सब घटित हो रहा है बहुत सा घटित हो चुका है। जिसमें बॉलीवुड को भी सबक सिखाना था। 

ये सब मैंने सुना था तो जब कुछ नया घटता है इस देश में, मैं मेनिफेस्टो याद कर लेता हूँ जो मैंने वहां सुना था। और ये न सोचें कि वहां सिर्फ़ ब्राह्मण ही थे इस मुग़ालते में मत रहिएगा। खटीक समाज नामक कोई संस्था के लोग तक थे। 

बाक़ी गाँधी ने मुझको बचा लिया। गाँधी की किताब 'मेरे सत्य के साथ प्रयोग' की ही ताक़त थी कि मैं उस नफ़रत से निकल आया। वरना नहीं निकल पाता कभी। अगर मैंने उस समय ये क़िताब न पढ़ी होती। महात्मा गाँधी का शुक्रिया। 

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