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यह काल्पनिक चिट्ठी ये सोचकर लिखी गई है कि आज पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कैसा महसूस कर रहे होंगे?

-राजीव श्रीवास्तव

प्रिय देशवासियों,

उम्मीद करता हूं कि आप लोगों ने मुझे भुलाया नहीं होगा। अगर भुला दिया है तो याद दिला दूं की मैं कभी भारत का प्रधानमंत्री था। वैसे तो अलग अलग पदों पर देश के अलग अलग प्रधानमंत्रियों ने मुझे रखा और रब दी सौं हर एक जगह पर आपके लिए पूरे मन से काम किया। यह इस देश की खासियत है की मुझ जैसे साधारण परिवार में पले लोग भी देश के उच्च पदों पर बैठ सकते हैं। लेकिन यह भी सत्य है की मैने "दूसरों" की तरह कभी अपने परिवार की गरीबी का जिक्र तक नहीं किया। 

थोड़ा बहुत पढ़ लिख गया था तो वही काम आया। परिवार का विभाजन में सब कुछ लुट गया था। धीरे धीरे परिवार को और मौका मिलने पर देश को भी पटरी पर लाया। मेरी सफलता आपकी भरी हुई जेब और आपके चेहरे की मुस्कुराहट में मुझे हमेशा दिखी। मैने कभी ज्यादा बोलने में विश्वास नहीं किया। जो काम मुझे सौंपा गया था उसको पूरी लगन से किया। नतीजा - देश विश्व की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया था। ज्यादा बोलने वाले तो आप देख ही रहे हैं, मैं क्या बोलूं। 

कड़े फैसले लेने में भी कभी पीछे नहीं हटा। चाहे अमरीका के साथ मित्रता हो या देश को न्यूक्लियर पावर बनाने का जुनून। कम्युनिस्ट साथियों की नाराज़गी भी झेली। हां यह जरूर है की ओबामा जी मेरे लिए मिस्टर प्रेसिडेंट थे, "बराक" नहीं। और ओबामा जी मुझे मनमोहन नहीं "गुरु" बोलते थे। मैं कभी विश्व के किसी नेता से गले नहीं मिला। वह बचपना होता है, वर्ल्ड पॉलिटिक्स में रामलीला नहीं चलती। सबके अपने हित होते हैं। कोई किसी का सगा नहीं होता। 

यह भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था और आपकी खुशहाली थी जिसकी वजह से मुझे विश्वपटल पर पहचान मिली। मेरी सफलता का श्रेय राव साहब, सोनिया गांधी और राहुल जी को भी जाता है लेकिन आपकी खुशी ही असली इनाम रहा। मैं रेनकोट पहनकर कभी नहीं नहाया। ईमानदारी से बोलूं तो नहाते समय कभी चढ्ढी भी नहीं पहनी। देखने वाले देखते रहें। 

आज जब देश कोरोना से जूझ रहा है तो मैं खुद अस्पताल में पड़ा हूं। थोड़ा दुखी भी हूं की आपके दुख में हाथ नहीं बटा पाया। लेकिन इस बात से विश्वस्त रहिए की अपनी आखिरी सांस तक मैं आपके साथ हूं। कभी अगर गलती से भी दोबारा मौका मिला तो देश की सेवा से पीछे नहीं हटूंगा। आप सब की अच्छी सेहत की कामना के साथ यह उम्मीद करता हूं की भारत सरकार जल्द इस महामारी से देश को मुक्ति दिलाए। 

जैसा मैंने पहले भी बोला, आशा करता हूं की इस देश का इतिहास मुझे मानवीय नजरों से देखेगा, किसी "हैवान" की नहीं। 

आपका भूला हुआ दोस्त

मनमोहन सिंह

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