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'आज तक' चैनल वाली श्वेता सिंह के नाम एक आम दर्शक की चिट्ठी, जाओ चुल्लू भर पानी तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है!

-राजीव श्रीवास्तव

प्रिय श्वेता सिंह,

प्रिय इसलिए नहीं लिखा की आप प्रिय हो। सिर्फ इसलिए लिखा की शायद आप उम्र में मुझसे छोटी हो। होली पर आपका एक घंटे से ज्यादा का प्रोग्राम देखा। दिल खुश हो गया। कितनी मेहनत की होगी आपने इस प्रोग्राम के लिए। धन्य हैं आप। बाकी यह पूछना था कि क्या आपने संविधान पढ़ा है? उसमें एक घिनौना शब्द है सेक्युलरिज्म। शायद आपने सुना भी हो। तो याद दिला दूं कि उसी दिन मुस्लिम भाइयों का शब-ए-बारात भी था। यह उस धर्म के बड़े पर्वों में से एक है। लेकिन आपने उसका जिक्र करना भी जरूरी नहीं समझा। बुरा तो आपको क्या ही लगा होगा? वैसे ढेर सारे फर्जी पुरस्कार जीतने की बधाई स्वीकार करें। 

आपकी एक वीडियो याद आ रही है। 2000 के नोट में चिप वाली। याद आया कुछ? जब उस वीडियो को देखा मेरी तो आंखें ही खुल गई। अब 2000 का नोट तो सब आप जैसे बड़े ले जाते हैं। कभी गलती से मिल गया तो मैं उसकी चिप निकालकर आपके स्टूडियो के पास ही फेंक आता हूं। हो सकता है कभी सैटेलाइट की इंफॉर्मेशन से आपके यहां छापा पड़ जाए तो माफ़ कर दीजियेगा। 

अच्छा एक बात बताइए कितने में बेचा अपना ज़मीर? क्या? पैसे नहीं लिए? मतलब फ़्री में? अरे यार फिर तो आप मोदीजी से उम्मीद लगाए बैठी होंगी की वह कुछ मंत्री संत्री बना देंगे? अजी आप बहुत पीछे हैं कतार में। अर्नब, सुधीर, अंजना आपसे आगे हैं। एक और बात। अपने डिस्प्ले एडिटर को बोलिए आपके नाम के आगे पत्रकार न लगाया करे। बेकार झूठा भी बनता है और एन राम, रवीश ऐसे पत्रकार को कलपाता भी है। और अगर आपने पैसे लिए तो कितने लिए से मुझे कोई मतलब नहीं है। आप बिकने को तैयार हैं तो नेता खरीदने में कहां पीछे है। 

वैसे स्टिंग ऑपरेशन, सच्ची खबर, खोजी पत्रकारिता ऐसे शब्द बोलने में ही कितने कठिन हैं। आपने सही किया जो ज़मीर बेच दिया नहीं तो इन भारी भारी शब्दों से आपकी कमर ही टूट जाती। एक बात और। यह किसान आंदोलन पर कोई प्रोग्राम तो नहीं कर रही हैं आप? बेकार झमेलों में मत पड़िएगा। आपको कौन सा अनाज खाना है हम गरीबों की तरह। मशरूम के खाली डिब्बे मोदीजी भिजवा ही देते होंगे। आपका काम तो उसी से चल जाएगा। झूठन खाने की पैदाइशी आदत जो है। 

अंत में आपसे विनती है कि एक बार अपने बच्चों के सिर पर हाथ रखकर सोचिएगा की जो आप कर रही हैं वह कितना सही है। देश बिक रहा है, अर्थव्यवस्था की ऐसी तैसी हो रही है, बेरोज़गारी और महंगाई चरम पर है लेकिन आप एक हिंसक और मनोवैज्ञानिक मरीज के गुणगान करने में लगी हैं। आपसे अच्छी तो सही मायने में एक वैश्या है जो कम से कम अपने धंधे और रोजीरोटी के प्रति ईमानदार तो है। 

खैर, बहुत हुआ सम्मान। अपना ख्याल रखना। अगर अपना दाम बता दो तो हम और ग्राहक भी ला देंगे जो आपकी इस दलाली का और अच्छा पैसा दे देंगे। आप कहीं ज्यादा कमा लेंगी। अगर शर्म आई हो तो आज ही सिंधु बॉर्डर जाकर एक प्रोग्राम करो। कलई खोल दो इस झूठी और मक्कार सरकार की। किसानों को खालिस्तानी बोलने वाले रिपोर्टर को नौकरी से निकालो। ज्यादा उम्मीद कर रहा हूं न? मालूम है मुझे। 

जाओ चुल्लू भर पानी तुम्हारा इंतज़ार कर रहा है।

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