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मित्रों, मेरा नाम 'सिस्टम' है, जुमलेबाजी मेरा प्रिय शगल है और जिम्मेदारियों से भागने की आदत मुझे बचपन से ही रही है

मित्रों,

मैं एक गरीब घर का बेटा हूं। मेरे पिताजी चायवाले थे। वैसे बचपन से ही मै थोड़ा कामचोर टाइप था। जब मेरे पिताजी मुझे काम करने के लिए बोलते तो मैं उन्हें कोई जुमला सुना कर चुप कर देता। पिताजी स्टेशन पर चाय बेचते थे। मैं कभी गलती से भी उधर नहीं गया। काम जो करना पड़ता!

फिर मेरे मां बाप ने मेरी शादी करा दी। लेकिन जिम्मेदारी से मेरा कभी कोई लेना देना नहीं था सो शादी के कुछ ही दिन बाद मैं घर से थोड़े पैसे और मां और बीवी के गहने लेकर चंपत हो लिया। अनेक शहरों की खाक छानी। पर मेरे जुमलों का कोई खरीदार नहीं मिल रहा था। एक दिन मैं नागपुर में संतरों के एक थोक व्यापारी के यहां गया। संतरे के व्यापारी ने मेरे जुमले सुने और मुझे अपनी शागिर्दी में रख लिया। मैंने देखा कि वो थोक व्यापारी संतरों में जहर मिलाकर बाज़ार में देता था। 

बस फिर क्या था। उसका जहर और मेरे जुमले। ऐसा गठजोड़ बना की सबने ने लोहा मान लिया। जिसने नहीं माना उसको मेरे जहर भरे संतरों ने ठिकाने लगा दिया। धीरे धीरे हमारे संतरे पूरे देश में अपना रंग दिखाने लगे। हमारा कोई विरोधी अगर कुछ बोलभर दे हमारे खिलाफ तो संतरों की फौज उसके पूरे खानदान को अपने जहर में लपेट लेती है। अगर हमसे कोई नौटंकी हो जाए, और यह हर दूसरे दिन होती है, तो हम और हमारे जहरीले संतरे उस नौटंकी का सेहरा किसी के भी सर मढ़ देते हैं। भले उस आदमी को मरे हुए पचास साल हो चुके हों। 

आजकल थोड़ा परेशान चल रहा हूं। सपना  था कि विश्व भ्रमण करना है। काफी देश घूम भी लिए लेकिन आजकल इस गरीब देश में ही रहना पड़ता है। हाऊ बोरिंग। सपना अधूरा है। पैसे का हिसाब भी समझ नहीं आ रहा। जिसको देखो पैसा चाहिए। किसी को दवा का, किसी को ऑक्सीजन का। अरे भाई उस थोक व्यापारी की ट्रेनिंग में सिर्फ जहर घोलने की कला सीखी थी, रामजादे, हरामजादे, कब्रिस्तान शमशान टाइप। पैसे वैसे के मैनेजमेंट का कोई सेशन हुआ ही नहीं। तो यह तो आउट ऑफ सिलेबस माना जाना चाहिए कि नहीं? माना जाना चाहिए की नही ?

फिर एक महिला मुनीम रखी। वो भी उसी संतरे वाले के यहां आती थी। हम समझे वो पढ़ी लिखी दिखती है संभाल लेगी। वो तो हमसे भी आगे निकली। एक फर्जी चाणक्य भी रखा। एक मटर छीलू और एक इमरती भी। लेकिन सब बेकार। आखिर में मेरे #मास्टरस्ट्रोक से ही देश चल रहा है। जिस दिन ज्यादा परेशानी हुई, झोला उठाकर चल दूंगा। अपना क्या है। 

आपका प्यारा

"सिस्टम"

डिस्क्लेमर : इस कहानी का किसी भी जिंदा या मृत व्यक्ति (जिसको शर्म आती हो) से कोई लेना देना नहीं है।

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