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डीयू की प्रोफेसर सुधा सिंह की 'साहित्य समीक्षा' पर मैत्रेयी पुष्पा की चिट्ठी, लेखक किसी वाद के तहत नहीं, अपनी धुन और लगन में लिखता जाता है

-मैत्रेयी पुष्पा

प्रिय सुधा, 

तुमने जो कुछ मेरी रचनाओं के आधार पर बोला या कहा, वह सुनकर मेरे जैसे किसी भी लेखक को बहुत ख़ुशी होगी। ख़ुशी से ज़्यादा यह इत्मिनान कि मेरी किताबों ने ज़रूर कुछ ऐसा कहा है जिस पर तुम अपना मनचाहा कहने के लिये तैयार हुई हो। तुम्हारी आलोचना को लेकर लोग क्या कहते हैं इसकी मैंने कभी पड़ताल नहीं की। अपने संग साथ में तुम्हें सुनकर अपनी ही धारणा बना ली और वही बात कुछ साल पहले फ़ेसबुक में अपनी वॉल पर लिख दी थी। मैं इतना तो जानती ही थी कि जब तक कोई किताब या लेखक तुम्हें प्रभावित न करें तुम अपनी कलम को खोलोगी नहीं। 

तुम वह नहीं जिसको आलोचना/समीक्षा लिखनी ही लिखनी है। बावजूद इसके तुमने स्त्री मुद्दों पर पूरे मन से किताबें लिखी हैं। तुम्हारा गहन अध्ययन इस बात की गवाही है कि तुमने स्त्रीवादी आन्दोलन को लेकर इस मुहिम में हिस्सा लिया है और इसे जीवित ही नहीं असरदार बनाकर भी रखा है। यह स्त्रीवाद जैसे आन्दोलन का ही परिणाम है कि मुझ जैसी गँवई स्त्री को महानगर में रहते हुये ऐसे दृश्यों को देखने और समझने का लाभ मिला जो मेरे लेखन के इलाक़े में मुझे नज़र नहीं आते थे। सिमोन द बउआर का नाम भी कुछ उपन्यासों को लिखने बाद सुना, पढ़ने का तो सवाल ही नहीं था। राजेन्द्र यादव प्रभा खेतान को स्त्रीविमर्श की पुरोधा मानते थे, इनकी रचनाओं के उदाहरण देते थे। छिन्नमस्ता उपन्यास और अन्या से अनन्या को हंस में धारावाहिक छापा था राजेन्द्र जी ने। स्त्री उपेक्षिता किताब सिमोन द बउआर के द सैकेन्ड सैक्स के अनुवाद के रूप में प्रभा खेतान ही लाई थीं ।

इतना सब देखकर मेरे अनुभव मुझे ही अशिक्षितों और असभ्यों की दास्तानें लगने लगे। मैं ऐसी दुनिया से परिचित नहीं थी कि वहाँ से कोई सिद्धांत निकले। हाँ दबे कुचलों और बंचितों की पीड़ा गाँव में में देखी और झेली भी।क्या इस सब को लिख दूँ तो साहित्य होगा? नहीं उस लड़ाई को भी लिखना होगा जो हमारे गाँव में ताक़तवरों के ख़िलाफ़ लड़ी गयी है। इस लड़ाई में जीत तो कम हुयीं हार ज़्यादा हुयीं। हार जीत की दास्तानें ही कथायें बनीं, जो बड़े रूप में आई उसे साहित्य में उपन्यास माना गया।

तुम समीक्षक हो। रचना को खोलकर देखना समीक्षक का हुनर होता है। तुमने मेरी रचनाओं की भाषा को खोला और मुझे बताया कि मेरी स्त्री पात्र स्त्री की ही भाषा बोलती है। उन कथाओं में औरत की बोली है। ऐसा मैंने उपन्यास या कहानी लिखते वक्त तो सोचा तक नहीं था। अब बताओ कि मेरा स्त्रीवाद से कितना साबका था? बेशक मेरा मानना है कि लेखक किसी वाद के तहत नहीं, अपनी धुन और लगन में लिखता जाता है, जो स्वाभाविक जीवन से निसृत होता है। और जब न तब अस्वाभाविक स्थितियाँ सामने आजाती हैं, ऐसे हालात से गुजरना तो होता है। 

कई पलायन कर जाते हैं, कुछ झेल नहीं पाते तो मर खप जा जाते हैं। वे विरले ही होते हैं जो जानलेवा स्थितियों के पार जाकर अकेले या अपने साथियों के साथ खड़े दिखते हैं। उसको या उनको कथानायक कहा जाता है।मगर मेरे चलते तो जो मर खप गये वे भी नायक नायिका हैं। तुमने ठीक ही तो कहा कि मृत रेशम की आवाज़ चाक में सारंग बनकर गूंजती रहती है। मैं  यहाँ स्त्रीवाद को ख़ारिज करने नहीं आई, अपनी बात अपने ढंग से लिखने की हिमायत करती रही हूँ क्योंकि विविधता का भी यही तक़ाज़ा है।

साहित्य की बातें तो असीमित होती हैं और मैं साहित्य के इस असीम में एक तिनका बनकर भी रहूँ तो समझूँगी कि मेरी क़लम सार्थक हुयी। जन्मदिन के बहाने रचनायें नया जीवन पा गयीं, यह बड़ी घटना रही। यह मौक़ा तुम्हारा व्याख्यान मुझे नज़राने में दे गया। 

बहुत शुक्रिया सुधा। जीती रहो।

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