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दुखी डॉक्टरों के नाम रवीश कुमार का ख़त, मैं क्या लिख रहा हूं, आप इससे आहत हो रहे हैं, लेकिन जो हो रहा है उससे आहत नहीं हो रहे हैं?

सम्मानित डॉक्टर जन,

हर बात में आहत हो जाएँगे तो कैसे चलेगा। डॉ गुलेरिया पर लिखा तो इसे लेकर भी आहत हो जा रहे हैं लोग। मैंने पोस्ट डिलिट कर दिया है। अगर समाज के सबसे रैशनल तबके की ऐसी प्रतिक्रिया होगी तो फिर किससे बात की जाए। अगर कोई सरकार के दबाव में है तो इस वक़्त दबाव में रहना मानवता की सेवा नहीं है। आप दबाव को उतार फेंकिए। इस्तीफ़ा दीजिए। 

मैं अभी सोच रहा हूँ। फिर से इस पोस्ट करूँ या नहीं। मैंने जो लिखा है एक एक बात सही लिखी है। लेकिन यह कैसा समाज हो गया है। तड़प कर मर जाएगा लेकिन बात से आहत हो जाएगा? सह तो रहे ही हैं सब। अस्पताल के डाक्टर से लेकर मरीज़ तक। लेकिन बात नहीं कही जाएगी तो सुधार कैसे होगा। 

एक डॉक्टर के बारे में लिखा तो कैसे वो सारे डाक्टरों के बारे में लिखना हो गया? कोई मुझे बताए। तो फिर सारे डाक्टर मिल कर सरकार ने जो कुव्यवस्था की है उसके ख़िलाफ़ क्यों नहीं बोलते हैं। वो बोलेंगे तो असर होगा। एक पेशेवर समुदाय के रूप में एकजुटता इस बात को लेकर क्यों नहीं है कि सरकार की लापरवाही से डाक्टरों और हेल्थ वर्कर पर यह तूफ़ान आया है। कब तक यह समाज सरकार के दबाव को ढोता रहेगा। क्या मर जाने तक सरकार के दबाव को ढोना इस वक़्त का तक़ाज़ा है? 

अगर डाक्टर दबाव को ढोएँगे तो फिर आम आदमी कहां जाएँगे। हम सब आप डाक्टरों के भरोसे हैं और रहेंगे। आप समाज का प्रभावशाली हिस्सा हैं। सरकार के झूठ की चादर को फाड़ दीजिए। पब्लिक में उतार कर दिखा दीजिए कि सच क्या है। भारत की जनता आपके साथ है। इस वक़्त या तो आप बोलें या हमें बोलने दें। हमारी कुछ बात आपको सही नहीं लगेगी लेकिन व्यापक नज़रिए से देखिए तो हम क्या बोल रहे हैं। 

आप डाक्टरों को समझना होगा। मैं क्या लिख रहा हूँ, आप इससे आहत हो रहे हैं लेकिन जो हो रहा है उससे आहत नहीं हो रहे हैं? क्या डाक्टरों के नहीं बोलने के कारण इस सरकार ने संसद में कोविड से मरने वाले डाक्टरों का आँकड़ा सही बता दिया? क्या सभी को बीमा या मुआवज़ा दिया? IMA तक को कई बार पत्र लिखना पड़ा। कई जगहों पर डाक्टरों को समय पर सैलरी तक नहीं दी गई। इन बातों से सारे डाक्टर एक होकर आहत क्यों नहीं होते हैं? 

आज अगर डा गुलेरिया बोल दें कि वे सरकार के दबाव में हैं और सरकार ने वो नहीं किया जो करना चाहिए था तो जनता उनके साथ खड़ी हो जाएगी। वो क्यों नहीं बोल रहे हैं। अब क्या बचा है इस समाज में। निदेशक के पोस्ट पर होना क्यों ज़रूरी है? डाक्टर तो पेड़ के नीचे क्लिनिक खोल कर अपना गुज़ारा कर सकते हैं। फिर वो क्यों चुप हैं। रवीश कुमार क्या लिख रहा है इससे आहत हो जा रहे हैं? अजीब है। हम सब जानते हैं कि क़सूर डाक्टरों का नहीं है। सरकार और सिस्टम ने उन पर पहाड़ गिरा दिया है। 

कौन नहीं जानता है और समझता है कि डाक्टरों और हेल्थ वर्कर पर इस वक़्त क्या गुजर रही है और इसके लिए क़सूरवार वो नहीं हैं। सरकार है। डाक्टरों को ही हम बोलने वालों का साथ देना चाहिए कि आप बोलिए। जैसे भी बोलिए लेकिन जनता को बताइये कि क्या हो रहा है और क्या हुआ।

- रवीश कुमार

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